Edited By Prachi Sharma,Updated: 16 Jan, 2026 12:37 PM
Bilvashtakam Stotra Mahatva : भगवान शिव को आशुतोष कहा जाता है, जिसका अर्थ है वह जो बहुत जल्दी प्रसन्न हो जाते हैं। शिव पुराण और लिंग पुराण जैसे शास्त्रों में शिव की महिमा का अनंत वर्णन है, लेकिन भक्त के लिए महादेव की कृपा पाने का सबसे सरल और...
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Bilvashtakam Stotra Mahatva : भगवान शिव को आशुतोष कहा जाता है, जिसका अर्थ है वह जो बहुत जल्दी प्रसन्न हो जाते हैं। शिव पुराण और लिंग पुराण जैसे शास्त्रों में शिव की महिमा का अनंत वर्णन है, लेकिन भक्त के लिए महादेव की कृपा पाने का सबसे सरल और प्रभावशाली माध्यम बिल्वाष्टकम् स्तोत्र माना गया है। मात्र एक बेलपत्र अर्पित करने से त्रिलोकीनाथ क्यों रीझ जाते हैं और इस स्तोत्र का आध्यात्मिक रहस्य क्या है, आइए विस्तार से समझते हैं।
बिल्वाष्टकम्:
बिल्वाष्टकम् स्तोत्र की रचना भगवान शिव के अनन्य भक्त और देवताओं के गुरु द्वारा मानी जाती है। इसमें कुल आठ श्लोक हैं, जिनमें से प्रत्येक श्लोक बेलपत्र की महिमा और शिव की असीम कृपा का गुणगान करता है। इसका मुख्य मंत्र है:
"दर्शनं बिल्ववृक्षस्य स्पर्शनं पापनाशनम्। अघोरपापसंहारं एकबिल्वं शिवार्पणम्॥"
इसका अर्थ है कि बिल्व के वृक्ष के दर्शन मात्र से और उसे स्पर्श करने से व्यक्ति के पापों का नाश होता है। एक बेलपत्र भगवान शिव को अर्पित करना घोर से घोर पापों को मिटाने वाला है।

एक बेलपत्र से क्यों प्रसन्न होते हैं शिव ?
हिंदू धर्म में बिल्व यानी बेल के वृक्ष को साक्षात् महादेव का रूप माना गया है। शिव को बेलपत्र प्रिय होने के पीछे कई आध्यात्मिक और वैज्ञानिक कारण हैं:
त्रिगुण और त्रिनेत्र का प्रतीक
बेल के एक पत्ते में तीन दल एक साथ जुड़े होते हैं। ये तीन दल महादेव के त्रिनेत्र, भगवान के त्रिशूल और सृष्टि के तीन गुणों सत्व, रज और तम का प्रतीक हैं। जब हम शिव को बेलपत्र चढ़ाते हैं, तो यह प्रतीकात्मक रूप से हमारे तीनों गुणों को ईश्वर के चरणों में समर्पित करने का संकेत है।
मां पार्वती का वास
पुराणों के अनुसार, बेल वृक्ष की उत्पत्ति देवी पार्वती के पसीने की बूंदों से हुई थी। इसके विभिन्न हिस्सों में माता के अलग-अलग स्वरूपों का वास माना जाता है। चूंकि शिव और शक्ति अभिन्न हैं, इसलिए जब भक्त शिव को बेलपत्र चढ़ाता है, तो वह अनजाने में शक्ति की भी पूजा कर रहा होता है, जिससे महादेव अत्यंत प्रसन्न होते हैं।
शीतलता का गुण
शिव ने जगत के कल्याण के लिए विष का पान किया था, जिससे उनके शरीर में अत्यधिक ताप उत्पन्न हुआ। बेलपत्र में प्राकृतिक रूप से शीतलता प्रदान करने वाले गुण होते हैं। इसे जल के साथ अर्पित करने से महादेव को शांति और शीतलता प्राप्त होती है, इसलिए वे भक्त पर अपनी कृपा बरसाते हैं।
Bilvashtakam Stotra Lyrics बिल्वाष्टकम् स्तोत्र
त्रिदलं त्रिगुणाकारं त्रिनेत्रं च त्रियायुधम्
त्रिजन्मपाप संहारं एक बिल्वं शिवार्पणम् ॥
अखण्ड बिल्व पात्रेण पूजिते नन्दिकेश्र्वरे
शुद्ध्यन्ति सर्वपापेभ्यो एक बिल्वं शिवार्पणम् ॥
शालिग्राम शिलामेकां विप्राणां जातु चार्पयेत्
सोमयज्ञ महापुण्यं एक बिल्वं शिवार्पणम् ॥
दन्तिकोटि सहस्राणि वाजपेय शतानि च
कोटि कन्या महादानं एक बिल्वं शिवार्पणम् ॥
लक्ष्म्या स्तनुत उत्पन्नं महादेवस्य च प्रियम्
बिल्ववृक्षं प्रयच्छामि एक बिल्वं शिवार्पणम् ॥
दर्शनं बिल्ववृक्षस्य स्पर्शनं पापनाशनम्
अघोरपापसंहारं एक बिल्वं शिवार्पणम् ॥
काशीक्षेत्र निवासं च कालभैरव दर्शनम्
प्रयागमाधवं दृष्ट्वा एक बिल्वं शिवार्पणम् ॥
मूलतो ब्रह्मरूपाय मध्यतो विष्णुरूपिणे
अग्रतः शिवरूपाय एक बिल्वं शिवार्पणम् ॥

Significance of Bilvashtakam Stotra बिल्वाष्टकम् स्तोत्र का आध्यात्मिक महत्व
स्तोत्र के अनुसार, जो व्यक्ति अखंड बेलपत्र शिव को चढ़ाता है, उसके जन्म-जन्मांतर के संचित पाप, जैसे कि ब्रह्महत्या या गुरु-निंदा जैसे दोष भी कम होने लगते हैं।
यह स्तोत्र भौतिक और आध्यात्मिक दोनों प्रकार की उन्नति प्रदान करता है। जो भक्त पूर्ण श्रद्धा से इसका पाठ करते हैं, उन्हें सुख, समृद्धि और अंततः मोक्ष की प्राप्ति होती है।
बेलपत्र चढ़ाते समय जब हम "त्रिदलं त्रिगुणाकारं..." पढ़ते हैं, तो हमारा ध्यान शरीर, मन और आत्मा के मिलन पर केंद्रित होता है। यह ध्यान की गहराई में जाने का एक सरल मार्ग है।
बेलपत्र चढ़ाने के कुछ नियम
शास्त्रों में बेलपत्र चढ़ाने के कुछ विशेष नियम बताए गए हैं जिनका पालन करना शुभ फलदायी होता है:
अखंड पत्ता: बेलपत्र हमेशा तीन पत्तियों वाला होना चाहिए और कहीं से भी कटा-फटा या छिद्रित नहीं होना चाहिए।
चिकना हिस्सा नीचे: शिवलिंग पर बेलपत्र अर्पित करते समय उसका चिकना हिस्सा शिवलिंग को स्पर्श करना चाहिए।
वर्जित दिन: चतुर्थी, अष्टमी, नवमी, चतुर्दशी और अमावस्या के दिन बेलपत्र नहीं तोड़ना चाहिए। इन दिनों के लिए पहले से तोड़े गए या मंदिर में चढ़ाए गए बेलपत्र को धोकर पुनः चढ़ाया जा सकता है (बेलपत्र कभी बासी नहीं होता)।
