Edited By Niyati Bhandari,Updated: 06 Nov, 2026 09:56 AM
Diwali 2026 Puja Vidhi & Muhurat: दीपावली 2026 पर लक्ष्मी-गणेश व कुबेर पूजन का सर्वश्रेष्ठ मुहूर्त, सरल विधि, महर्षि भृगु जी का अचूक लक्ष्मी प्राप्ति महामंत्र और अथर्ववेद का पौराणिक रहस्य जानें।
Diwali 2026 Puja Vidhi & Muhurat: सनातन धर्म का सबसे पवित्र और प्रकाशमयी पर्व दीपावली भगवान श्रीराम चंद्र जी, धन-धान्य की देवी माता लक्ष्मी जी, विघ्नहर्ता श्री गणेश जी और कोषाध्यक्ष श्री कुबेर जी की आराधना को समर्पित है। इस महापर्व पर श्रद्धालु विधिवत पूजन करके अपने घर-परिवार में सुख, समृद्धि, ऐश्वर्य और शांति की मनोकामना करते हैं। इस वर्ष दीपावली का यह पावन पर्व कार्तिक कृष्ण अमावस्या को 8 नवंबर 2026 को मनाया जाएगा।
वैदिक मान्यताओं के अनुसार, लक्ष्मी जी का आशीर्वाद केवल सांसारिक धन तक सीमित नहीं है, बल्कि यह जीवन के सर्वोच्च लक्ष्य 'मोक्ष' और सत्कर्मों का प्रतीक भी है। आइए जानते हैं, इस वर्ष दीपावली पूजन का सटीक मुहूर्त, संपूर्ण पूजन विधि, महर्षि भृगु जी द्वारा रचित अचूक लक्ष्मी प्राप्ति महामंत्र तथा शास्त्रों में वर्णित लक्ष्मी-गणेश पूजन का आध्यात्मिक रहस्य।
दीपावली 2026 तिथि एवं शुभ पूजन मुहूर्त (गृहस्थ व व्यापार हेतु)
पंचांग गणना के अनुसार, कार्तिक कृष्ण अमावस्या तिथि का प्रारंभ 8 नवंबर 2026 को प्रातः 11:27 बजे से होगा, जो 9 नवंबर 2026 को दोपहर 12:31 बजे तक रहेगा। शास्त्रों के नियमानुसार प्रदोष काल में अमावस्या तिथि होने के कारण लक्ष्मी पूजन 8 नवंबर 2026 को ही संपन्न किया जाएगा।
लक्ष्मी पूजन हेतु शुभ मुहूर्त समय सारणी
घर-परिवार हेतु पूजन वृषभ स्थिर लग्न (सायंकाल) सायंकाल 5:54 से 7:50 बजे तक 1 घंटा 56 मिनट
कारोबार / व्यापार / फैक्टरी सायंकालीन शुभ मुहूर्त सायंकाल 5:31 से 8:48 बजे तक 3 घंटे 17 मिनट
शास्त्रीय दीपावली पूजन विधि
दीपावली की शाम को घर और कार्यस्थल पर पूर्ण पवित्रता के साथ पूजन किया जाता है। इसकी प्रामाणिक विधि निम्नलिखित है:
स्थान शुद्धि एवं स्थापना: सर्वप्रथम पूजा स्थल की अच्छी तरह सफाई करें। गंगाजल का छिड़काव करके लाल रंग का आसन बिछाएं।
प्रतिमा स्थापना: आसन पर बाईं तरफ माता लक्ष्मी जी, दाईं तरफ विघ्नहर्ता श्री गणेश जी तथा पास में ही श्री कुबेर जी की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें। साथ में मंगल कलश की स्थापना करें।
दीपक एवं संकल्प: देसी घी की अखंड जोत प्रज्वलित करें तत्पश्चात अपने हाथ में जल, अक्षत (चावल) और पुष्प लेकर पूजन का संकल्प लें।
उपचार अर्पण: सभी देव आत्माओं को तिलक लगाएं। इसके बाद अन्न, फल, वस्त्र, पुष्प, रोली, मौली तथा मिष्ठान अर्पित करें।
आरती का शास्त्रीय क्रम:
सर्वप्रथम श्री गणेश जी की आरती करें।
तत्पश्चात माता लक्ष्मी जी की आरती करें।
इसके बाद श्री कुबेर जी की आरती व प्रार्थना करें।
अंत में श्रीहरि विष्णु जी की प्रार्थना एवं आरती संपन्न करें।
भोग एवं प्रसाद: आरती के बाद सभी देवी-देवताओं को मिष्ठान का भोग लगाएं और उस भोग को परिवारजन प्रसाद स्वरूप ग्रहण करें।

महर्षि भृगु रचित लक्ष्मी प्राप्ति एवं स्थिरता महामंत्र
ज्योतिष शास्त्र के प्रणेता महर्षि भृगु जी के अनुसार, घर में माता लक्ष्मी का स्थायी निवास बनाए रखने के लिए घर के मुखिया को दीपावली की रात्रि इस महामंत्र का पूर्ण विधान से अधिकाधिक जाप करना चाहिए।
दिवाली पूजा की आवश्यक सामग्री एवं तैयारी:
माता लक्ष्मी की विराजमान (बैठी हुई) अवस्था की तस्वीर या प्रतिमा।
9 गुलाब के फूल एवं 1 कमल का पुष्प।
9 कमलगट्टे एवं कमलगट्टे की शुद्ध माला।
लाल चंदन की लकड़ी, रोली, मौली, दक्षिणा।
7 गुड़ की पूर्ण पेड़ी (जिन पर किसी नुकीली वस्तु से स्वास्तिक का चिह्न अंकित किया गया हो)।
प्रार्थना एवं संकल्प:
माता लक्ष्मी की प्रतिमा के समक्ष देसी घी का दीपक जलाकर यह प्रार्थना करें:
"हे माता! हमें धन, धान्य, ऐश्वर्य, आनंद, वैभव, यश, मान और कीर्ति प्रदान करें। कारोबार में उन्नति प्रदान करें एवं जो भी समृद्धि आप प्रदान करें, उसका पूर्ण सुख भी भोगने की कृपा करें।"
सिद्ध भृगु महामंत्र:
ओउम श्री शुक्ले महाशुक्ले कमलदल निवासे श्री महालक्ष्म्यैः नमों नमः।
लक्ष्मी माई सत्य की सवाई, आवो माई करो भलाई, न करो तो सात समुद्र की दुहाई, ऋिद्धि सिद्धि खावोगी तो नौ नाथ चैरासी की दुहाई।।
मंत्र जाप के बाद की आवश्यक विधि:
मंत्र जाप के पश्चात 1 गुड़ की पेड़ी का भोग लगाकर उसे पूरे परिवार में प्रसाद रूप में बांट दें।
अगले दिन शेष बची हुई 6 गुड़ की पेड़ियों को 21 रोटियों के साथ गाय को दान स्वरूप खिला दें।
पूजन में रखी गई दक्षिणा को घर के उस स्थान पर स्थापित करें जहां आप धन रखते हैं (तिजोरी या लॉकर)। इससे वर्ष भर धन-धान्य की कमी नहीं होती।
वेद और पुराणों में लक्ष्मी जी का वास्तविक स्वरूप: पुण्य बनाम पाप लक्ष्मी
वैदिक संस्कृति में लक्ष्मी जी केवल धन-संपत्ति की देवी नहीं हैं। ऋग्वेद में 'लक्ष्मी' शब्द का मूल अर्थ 'लक्ष' से लिया गया है, जिसका अर्थ है 'लक्ष्य' या 'उद्देश्य'। अर्थात लक्ष्मी जी का उद्देश्य मानव जीवन को मोक्ष की ओर ले जाना भी है।
अथर्ववेद (12.5.6) का उपदेश
अथर्ववेद में लक्ष्मी जी के दो रूपों का वर्णन मिलता है:
पुण्य लक्ष्मी: धर्म, सत्य और सत्कर्मों से अर्जित धन।
पाप लक्ष्मी: अधर्म, छल और पाप कर्मों से एकत्र किया गया धन।
यह संदेश देता है कि अधर्म से अर्जित 'पाप लक्ष्मी' विनाश लाती है, जबकि सत्य और सत्कर्मों से प्राप्त 'पुण्य लक्ष्मी' ही घर में सुख-शांति और स्थिरता प्रदान करती है।
अष्टलक्ष्मी, चार भुजाओं का रहस्य और गणेश पूजन का महत्त्व
पुराणों में पूर्वजों ने माता लक्ष्मी के आठ कल्याणकारी स्वरूपों का उल्लेख किया है, जिन्हें अष्टलक्ष्मी कहा जाता है:
आदिलक्ष्मी (सृष्टि की मूल शक्ति)
धान्यलक्ष्मी (अन्न एवं पोषण)
धैर्यलक्ष्मी (साहस एवं आत्मबल)
गजलक्ष्मी (राजसी वैभव व सामर्थ्य)
संतानलक्ष्मी (सुलक्षण संतति)
विजयलक्ष्मी (सफलता एवं जीत)
विद्यालक्ष्मी (ज्ञान एवं कला)
धनलक्ष्मी (भौतिक समृद्धि)

प्रतीकात्मक अर्थ:
चार भुजाएं: माता लक्ष्मी की चार भुजाएं मानव जीवन के चार पुरुषार्थों धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष का प्रतीक हैं।
हाथों में कमल: कमल का फूल यह सिखाता है कि सांसारिक माया-मोह के बीच रहते हुए भी व्यक्ति को उससे असंपृक्त और पवित्र रहना चाहिए। यह आंतरिक संतुलन और शांति का संदेश देता है।
पद्म पुराण संदर्भ व श्री गणेश जी का साथ: पद्म पुराण के अनुसार, देवशयनी एकादशी पर जब भगवान विष्णु चार माह के लिए योगनिद्रा में चले जाते हैं, तब माता लक्ष्मी भी विश्राम में होती हैं। कार्तिक शुक्ल एकादशी को भगवान विष्णु के जागने से पूर्व ही दीपावली पर लक्ष्मी जी का विशेष पूजन किया जाता है।
पूजन में विघ्नहर्ता श्री गणेश जी माता लक्ष्मी के पुत्र स्वरूप साथ में विराजमान होकर पूजे जाते हैं। गणेश जी का आशीर्वाद यह सुनिश्चित करता है कि भक्तों को प्राप्त समृद्धि में कोई विघ्न न आए और उनके सभी कष्टों का निवारण हो सके।
Sanjay Dara Singh
AstroGem Scientist
9416665552
LLB., Graduate Gemologist GIA (Gemological Institute of America), Astrology, Numerology and Vastu (SSM).
