श्री मुक्तसर साहिब का गौरवशाली इतिहास: खिदराने की ढाब से 40 मुक्तों की पवित्र धरती तक

Edited By Updated: 14 Jan, 2026 06:17 PM

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The glorious history of Sri Muktsar Sahib: मुक्तसर से श्री मुक्तसर साहिब बने ऐतिहासिक शहर का नाम पहले खिदराना था जहां खिदराने की ढाब थी। यह क्षेत्र जंगली होने के कारण यहां अक्सर पानी की कमी रहती थी। इलाके में जलस्तर अत्यधिक गहराई पर होने के कारण यदि...

The glorious history of Sri Muktsar Sahib: मुक्तसर से श्री मुक्तसर साहिब बने ऐतिहासिक शहर का नाम पहले खिदराना था जहां खिदराने की ढाब थी। यह क्षेत्र जंगली होने के कारण यहां अक्सर पानी की कमी रहती थी। इलाके में जलस्तर अत्यधिक गहराई पर होने के कारण यदि कोई प्रयत्न कर कुंआ आदि लगाने की कोशिश भी करता तो पानी इतना खारा निकलता था कि वह पीने योग्य नहीं होता था इसलिए यहां एक ढाब खुदवाई गई जिसमें बारिश का पानी जमा किया जाता।

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इस ढाब का मालिक खिदराना था जो फिरोजपुर जिले के जलालाबाद का निवासी था, जिस कारण इसका नाम खिदराने की ढाब पड़ा। इसी जगह गुरु गोबिंद सिंह जी ने मुगल फौज के खिलाफ अपनी अंतिम जंग लड़ी जिसे खिदराने की जंग कहा जाता है। जब गुरु जी ने 1705 ईस्वी में धर्म युद्ध करते हुए श्री आनंदपुर साहिब का किला छोड़ा तो आपने दुश्मनों की फौज से जंग करते हुए विभिन्न स्थानों से होते हुए मालवा की धरती की ओर रुख किया।

कोटकपूरा पहुंचकर गुरु जी ने चौधरी कपुरे से किले की मांग की, लेकिन मुगल हकूमत के डर से चौधरी ने किला देने से इंकार कर दिया। तब गुरु जी ने सिपाहियों समेत खिदराने की ओर चलना शुरू कर दिया और खिदराने की ढाब पर पहुंचे।

तभी दुश्मन की फौज सरहिंद के सूबेदार की कमान में यहां पहुंच गई। 40 सिंह यौद्धाओं, जो कभी बेदावा लिख कर दे गए थे, ने भी गुरु जी के साथ मिलकर खिदराने की ढाब पर मोर्चे कायम कर लिए। खिदराने की ढाब सूखी पड़ी थी, इसके इर्द-गिर्द झाड़िया उगी थीं।

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सिंहों ने झाड़ियों का आसरा लिया और मुगल सिपाहियों की आती फौज पर एकदम से टूट पड़े। सिख फौज की बहादुरी देखकर मुगल फौज जंग के मैदान से भाग गई।  इस जंग में मुगल फौज के अधिकतर सिपाही मारे गए और गुरु जी के भी कई सिंह शहीद हो गए।
इसी जगह गुरु गोबिंद सिंह जी ने घायल भाई महा सिंह को अपनी गोद में लेकर बेदावा फाड़कर बेदवाइए सिंहों को मुक्त किया। भाई महा सिंह जी ने इसी जगह पर शहीदी प्राप्त की।

इस जंग में माता भाग कौर ने भी जौहर दिखाए और घायल हुए जिनकी मरहम पट्टी गुरु जी ने अपने हाथों से की और तंदरुस्त होने उपरांत खालसा दल में शामिल कर लिया।

40 मुक्तों की इस पवित्र धरती पर माघी के शुभ अवसर पर दूर-दराज से लाखों की संख्या में श्रद्धालु पहुंच कर पवित्र स्रोवर में स्नान कर अपना जीवन सफल करते हैं।

ऐतिहासिक गुरुद्वारे
यहां स्थिति ऐतिहासिक गुरुद्वारे हैं - गुरुद्वारा टुट्टी गंढी साहिब, गुरुद्वारा तंबू साहिब, गुरुद्वारा माता भाग कौर जी , गुरुद्वारा शहीद गंज साहिब, गुरुद्वारा टिब्बी साहिब, गुरुद्वारा रकाबसर साहिब, गुरुद्वारा दातनसर साहिब, गुरुद्वारा तरनतारन दुख निवारण साहिब।

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