मानो या न मानो: जो भाग्य में होता है वो खुद चलकर आपके पास आता है

Edited By Updated: 03 Nov, 2022 07:44 AM

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मंद-मंद हवा की ठंड, जो अंदर तक सिहरन भर देती है, वाला मौसम था। बस दो चीजें इस मौसम में सुकून देती हैं, एक आग की तपन और दूसरी फर की रजाई में दुबके रहना

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Inspirational Story: मंद-मंद हवा की ठंड, जो अंदर तक सिहरन भर देती है, वाला मौसम था। बस दो चीजें इस मौसम में सुकून देती हैं, एक आग की तपन और दूसरी फर की रजाई में दुबके रहना। सुबह-सुबह उठना तो बस जैसे आफत हो, पर क्या करें ? ठंड हो या गर्मी, जीवन तो चलायमान है, उठना ही पड़ेगा। सुबह 5 बजे ही अलार्म के साथ जंग शुरू हो जाती है। जैसे ही बजा, रजाई से हाथ निकाल कर उसे फिर स्नूज पर कर देना। वह फिर बजेगा और फिर स्नूज कर दिया जाएगा, पर अंतत: अलार्म की जीत होती है और उठना पड़ता है। हर सुबह एक जैसी होती है। सबसे पहले अपने हाथों के दर्शन कर ‘कराग्रे बसते लक्ष्मी, करमध्ये सरस्वती, करमूले तू गोविंदम, प्रभात कर दर्शनम’ का उच्चारण करें।

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कुछ संस्कार ऐसे होते हैं जो हमें माता-पिता से आते हैं, जिन्हें हम बचपन में मानें या न मानें, पर जब हम स्वयं माता-पिता बन जाते हैं तो उनका पालन बड़ी शिद्दत से करते हैं। रोजाना प्रात: बबली धरती पर पैर रखने से पहले धरती मां की वंदना, फिर ‘भास्कर विद्महे महातेजाए धीमहि तन्नो सूर्य प्रचोदयात’ का तीन बार उच्चारण कर सुबह की शुरूआत करती, पर आज कुछ अलग होना था।
प्रकृति हमें हर मोड़ पर सबक देती है, पर इंसान उसे समझता तो है, अपनाता नहीं। अब यही देख लो, प्रकृति दोनों हाथों से अपना सर्वस्व मानव पर न्यौछावर करती है, फिर भी हमारा मन नहीं भरता और हम उसका दोहन ही करते रहते हैं। कभी उसकी तरह देना नहीं सीखा, बस लेना ही आता है।

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मोबाइल पर भजन लगाकर सुबह का नजारा देखने के लिए बबली ने पर्दा हटाया तो धुंध में बिल्ली जैसा कुछ दिखाई दिया, जो इधर से उधर कूद रहा था। जैसे ही उसने ध्यान से देखा तो एक बिल्ली छोटे से चूहे के साथ जैसे खेल रही थी। चूहा बेचारा उसके चंगुल से भागने की कोशिश कर रहा था। कभी दाएं भागता कभी बाएं, पर बिल्ली झट उसे अपने पंजे से पकड़ कर कभी इधर पटक रही थी कभी उधर, जैसे वह अपने शिकार से खेलकर आनंद पा रही हो।

ये सब देख कर बबली का मन विचलित हो गया। उसे कुछ नहीं सूझ रहा था, पर जितना उस वक्त दिमाग ने काम किया, उसने फटाफट एक कटोरा दूध से भरा और इस आशा में बाहर जाकर बिल्ली के सामने रख दिया कि शायद वह दूध के लालच में चूहे को छोड़ दे, क्योंकि सुबह-सुबह चूहे की विवशता और हालत देख कर बबली का मन द्रवित हो रहा था।

उसके सामने अजीब धर्मसंकट आ गया था। एक तरफ वह चूहे की जान बचाना चाहती थी, पर दूसरी तरफ बिल्ली के मुंह का ग्रास छीनकर ‘जीव जीवस्य भोजन’ के विपरीत भी कुछ नहीं करना चाह रही थी। अगर वह बिल्ली को भगा देती तो शायद बिल्ली चूहे को मार कर उसे वहीं छोड़कर चली जाती, तो चूहे बेचारे की जान भी जाती और बिल्ली की मेहनत भी बेकार जाती।

फिर भी उसने एक कोशिश की बिल्ली को भगाने की, पर बिल्ली ने खतरा भांपा और झट चूहे को मुंह में दबोचकर मार दिया और उसे लेकर वहां से भाग गई। बबली ने दूध के कटोरे की तरफ देखा और मायूसी के साथ अंदर आकर अपने रसोई के काम में लग गई। थोड़ी देर बाद उसे ध्यान आया, दूध का कटोरा आंगन में अच्छा नहीं लग रहा होगा। पड़ोसी भी बाहर आ-जा रहे थे। वह दूध का कटोरा लाने बाहर गई तो बिल्ली उसे पीकर जा चुकी थी। बबली के मन में जो मासूयी थी, वह अब न रही।

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यह घटना उसे अपनी नानी की एक कहानी की शिक्षा याद दिला गई। किसी की मेहनत और संघर्ष उसे सफलता के द्वार तक पहुंचाते हैं। कर्म से ही कार्यों की सिद्धि होती है। जैसे बिल्ली ने कर्म और मेहनत की तो चूहा उसे भोजन रूप में मिला और जो भाग्य में होता है, वह अपने आप चल कर आता है, जैसे चूहा खाने के बाद बिल्ली को दूध से भरा कटोरा मिलना।

कर्म करने वाले को उसकी मेहनत का फल मिल ही जाता है और जो भाग्य में होता है वो खुद चलकर आपके पास आ जाता है इसलिए कर्मरत रहना चाहिए। आज बिल्ली का कर्म तो उत्तम था ही, साथ ही भाग्य भी उस पर मेहरबान था।

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