क्या आपका मन ही आपकी बीमारियों की जड़ है ? आत्म-अवलोकन से बदलें अपनी किस्मत

Edited By Updated: 10 Jan, 2026 02:40 PM

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हम सभी अपने शरीर के प्रति इतने जागृत रहते हैं कि यदि हमारे शरीर में कोई छोटा-सा रोग भी हो जाए तो हम इतने अधीर हो जाते हैं कि तुरंत ही डॉक्टर के पास जाकर हम उसका इलाज शुरू कर देते हैं।

Motivational Story : हम सभी अपने शरीर के प्रति इतने जागृत रहते हैं कि यदि हमारे शरीर में कोई छोटा-सा रोग भी हो जाए तो हम इतने अधीर हो जाते हैं कि तुरंत ही डॉक्टर के पास जाकर हम उसका इलाज शुरू कर देते हैं। जाहिर-सी बात है कि ऐसा करना हमारे लिए एक स्वाभाविक बात है क्योंकि हम सभी इस तथ्य से भली-भांति वाकिफ हैं कि ‘जान है तो जहान है’ अर्थात शरीर स्वस्थ है तो सब कुछ संभव है इसलिए उसे ठीक रखना हमारा परम कर्तव्य है।

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किन्तु हममें से कितने लोग यह जानते होंगे कि शरीर की अपनी एक सीमित भूमिका है जो मन की भेंट में तुलनात्मक रूप से कम है। अत: मन यदि अस्वस्थ है तो उसका सीधा असर तन के ऊपर भी पड़ता है। इसी कारण आज विश्व के अधिकांश चिकित्सक इस बात पर सहमत हैं कि यदि मन के रोगों का उपचार सही ढंग से कर दिया जाए तो तन का उपचार अपेक्षाकृत सरल हो जाता है ।

वास्तव में देखा जाए तो शरीर तो केवल मन का अनुयायी है। मन जैसा आदेश देता है, शरीर ठीक वैसा ही व्यवहार करने लगता है। लगातार चिंता में डूबा मन शरीर को थका देता है, नकारात्मक भावनाओं से भरा मन रोगों के लिए अनुकूल वातावरण तैयार कर देता है। यही कारण है कि आज कई ऐसी बीमारियां सामने आ रही हैं जिनकी जड़ें  दवाओं से नहीं, बल्कि अव्यवस्थित मन से जुड़ी हुई हैं ।

अमूमन लोग बाहरी रूप से यह कहते रहते हैं कि हमें कुछ तकलीफ नहीं है, हमारा शरीर तो बिल्कुल स्वस्थ और अनगढ़ है, परन्तु यदि हमारा मन ईष्या, द्वेष, बदला, नफरत, लगाव, पक्षपात, महत्वाकांक्षा, कामना, तृष्णा जैसे रोगों से ग्रसित हो तो क्या उसका असर हमारे तन पर नहीं दिखेगा ? क्या उससे हमें कोई तकलीफ नहीं होगी ?

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याद रखें ! मन के विकारों का दर्द दूर-दूर तक जाता है और कइयों को दर्द देने के निमित्त बन जाता है इसलिए मानसिक रोगों को शारीरिक रोगों से कई गुणा ज्यादा खतरनाक कहा गया है। शारीरिक रोग तो दिख भी जाते हैं, उनका नाम भी लिया जा सकता है, उनका इलाज भी स्पष्ट होता है; लेकिन मानसिक रोग चुपचाप भीतर घर कर लेते हैं। वे मुस्कान के पीछे छिपे रहते हैं और धीरे-धीरे जीवन की सहजता छीन लेते हैं।

बाहर से व्यक्ति हंसता हुआ दिख सकता है, पर भीतर से वह घुटन, असंतोष और अशांति से जूझ रहा होता है। यही अदृश्य रोग सबसे अधिक नुकसान पहुंचाते हैं। तो क्या इन रोगों का कोई इलाज नहीं ? अवश्य है! मन के सभी रोगों का सरल से सरल इलाज है आत्म-अवलोकन। जी हां ! आत्म-अवलोकन एक ऐसी सहज विधि है जो हमें आत्म-परिवर्तन करने में बहुत मदद करती है।

महाभारत में एक यादगार प्रसंग आता है जहां पर दुर्योधन के प्रति अर्जुन का गुस्सा और बदला लेने की भावना को देखकर युधिष्ठिर उसे यह प्रश्न  पूछते हैं कि ‘क्या दुर्योधन को सजा देने का अधिकार तुमको मिल गया?’

यह प्रश्न आत्म-अवलोकन के लिए हम सभी को अपने आप से पूछना चाहिए क्योंकि वास्तव में देखा जाए तो न भगवान ने और न ही किसी सरकार ने हमको किसी के अपराधों के लिए दंड देने के निमित्त बनाया है। तो फिर हम अपने मिले हुए कार्यों को छोड़कर बेकार में यह अतिरिक्त कार्य करने में व्यर्थ ही अपना भार क्यों बढ़ाते हैं?

दंड देने का कार्य जिसका भी है, वह करे, हमें भगवान ने सबके प्रति शुभ सोचने, प्यार करने, कल्याण करने, मदद करने, क्षमा करने का कार्य दिया है, तो हम वही क्यों न करें? यदि कोई व्यक्ति गर्म कोयला अपने हाथ में उठाकर दूसरे पर फैंकता है तो प्रथम तो वह उसी के हाथ को जलाएगा।

इसी प्रकार जब कोई दूसरे का बुरा सोचता है तो पहले तो उसका अपना ही बुरा होता है। शरीर बीमार हुआ, धन-हानि हुई, संबंध कड़वा हुआ, प्रकृति ने नुकसान किया, ये सब हमारे ही बोए हुए बीजों के फल हैं। तो फसल को देख दुखी होने और दोषारोपण करने के बजाय क्यों न हम बीजों को ही सुधार लें? यदि बीज शुद्ध होंगे तो फसल अपने आप ही श्रेष्ठ होगी। यही जीवन का अटल नियम है।

इसलिए अपने संकल्पों को परमात्म-ज्ञान और योगबल से इतना पवित्र बना लें कि उनसे न केवल इस जीवन में, बल्कि आने वाले कई जन्मों तक कोई अनचाहा फल उत्पन्न न हो। तो चलिए, आज से खुद के परिवर्तन की ओर ध्यान केंद्रित करें, न कि दूसरों के परिवर्तन की ओर क्योंकि अंतत: तो हम बदलेंगे तो जग बदलेगा। 

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