घर की दक्षिण दिशा में है दोष तो आजमाएं ये वास्तु उपाय

Edited By Updated: 16 Jul, 2021 05:01 PM

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कहा जाता है वास्तु शास्त्र में दक्षिणमुखी मकान व दुकान दोनों को ही शुभ नहीं माना जाता। जिस कारण लोग प्रयास करते हैं कि इस घर व दुकान दक्षिणमुखी न हो। लेकिन कई बार जाने-अनजाने में या

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कहा जाता है वास्तु शास्त्र में दक्षिणमुखी मकान व दुकान दोनों को ही शुभ नहीं माना जाता। जिस कारण लोग प्रयास करते हैं कि इस घर व दुकान दक्षिणमुखी न हो। लेकिन कई बार जाने-अनजाने में या मजबूरी के चलते ऐसा करना पड़ता है। जिस कारण लोग इस बात से परेशान हो जाते हैं कि उन्हें इसके चलते अशुभ प्रभावों का सामना करना पड़ता है। मगर क्या आप जानते हैं कि कुछ ऐसी परिस्थितियां भी होती हैं, जब दक्षिणमुखी मकान व दुकान अशुभ प्रभाव नहीं देते। या कई बार ये भी कहा जाता है कछ स्थितियां होती हैं जब इस दिशा का दोष खत्म हो जाता है। 

दरअसल वास्तु शास्त्र के अनुसार दक्षिणमुखी मकान या दुकान कैसा प्रभाव देता है यह इस बात पर निर्भर करती है मकान का वास्तु, मुहल्ले का वास्तु तथा उसके आस-पास स्थित वातावरण और वृक्षों की स्थिति कैसी है। परंतु यदि आपको लग रहा है कि आपका दक्षिणमुखी मकान या दुकान दुषप्रभाव दे रहा है तो आप वास्तु में बताए गए कुछ उपाय कर सकते हैं। यहां जानिए कौन से है वो खास उपाय जो दक्षिणमुखी मकान के दुष्प्रभाव से बचाव करते है। 

वास्तु के अनुसार मंगल की दिशा दक्षिण मानी गई है। इससे जुड़ी शुभ प्रभाव पाने के लिए दक्षिण दिशा में नीम का एक बड़ा सा वृक्ष जरूर होना चाहिए।

द्वार के ऊपर पंचमुखी हनुमानजी का चित्र भी लगाएं। कहा जाता है द्वार के ठीक सामने आशीर्वाद मुद्रा में हनुमान जी की मूर्ति अथवा तस्वीर लगाने से भी दक्षिण दिशा की ओर मुख्य द्वार के वास्तुदोष का नाश होता है।

अगर घर दरवाजा दक्षिण की तरफ हो तो द्वार के ठीक सामने एक आदमकद दर्पण इस प्रकार लगाना चाहिए, कि घर में प्रवेश करने वाले व्यक्ति का पूरा प्रतिबिंब दर्पण में बने।

इसके अलावा दक्षिण दिशा में मुख्य द्वार या खिड़की हो तो उस द्वारा या खिड़की को बदलकर पश्‍चिम, उत्तर, वायव्य, ईशान या पूर्व दिशा में कर देना चाहिए, इससे   दक्षिण के बुरे प्रभाव बंद हो जाते हैं।

वास्तु शास्त्री मानते हैं कि द्वार के ऊपर पंचधातु का पिरामिड लगवाने से भी वास्तुदोष समाप्त होता है।

इसके अतिरिक्त दक्षिणम दिशा के दोष से राहत पाने के लिए गणेश जी की पत्थर की दो मूर्ति बनवाएं जिनकी पीठ आपस में जुड़ी हो। इस जुड़ी गणेश प्रतिमा को मुख्य द्वार के बीचों-बीच चौखट पर फिक्स कर दें, ताकि एक गणेशजी अंदर को देखें और एक बाहर को।
 

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