Edited By Niyati Bhandari,Updated: 05 Jan, 2026 09:01 AM

Magh Mela 2026: कुम्भ की तरह ही माघ मेले का हिन्दू धर्म में विशेष महत्व है। इस बार यह मेला 3 जनवरी, 2026 से शुरू होकर 15 फरवरी, 2026 तक रहेगा। कुम्भ मेला हर 12 साल में चार पवित्र स्थानों (प्रयागराज, हरिद्वार, उज्जैन, नासिक) पर बारी-बारी से लगता है...
Magh Mela 2026: कुम्भ की तरह ही माघ मेले का हिन्दू धर्म में विशेष महत्व है। इस बार यह मेला 3 जनवरी, 2026 से शुरू होकर 15 फरवरी, 2026 तक रहेगा। कुम्भ मेला हर 12 साल में चार पवित्र स्थानों (प्रयागराज, हरिद्वार, उज्जैन, नासिक) पर बारी-बारी से लगता है जबकि माघ मेला प्रयागराज में हर साल माघ महीने (जनवरी-फरवरी) में लगने वाला एक वार्षिक और छोटा मेला है। आइए जानते हैं माघ मेला हर साल क्यों लगता है, क्या है इसका इतिहास और महत्व।
उत्तर प्रदेश के प्रयागराज में आयोजित होने वाला यह विशाल मेला दुनिया के सबसे पुराने और सबसे बड़े आध्यात्मिक आयोजनों में से एक माना जाता है। दरअसल, प्रयागराज वह तीर्थ है जहां तीन पवित्र नदियां गंगा, यमुना और सरस्वती का संगम है। माघ संगम में स्नान करने वालों को अमृत के गुण प्राप्त होते हैं।

मेले का महत्व
पद्मपुराण में बताया गया है कि अन्य मास में जप, तप और दान से भगवान विष्णु उतने प्रसन्न नहीं होते जितने कि माघ मास में नदी और तीर्थस्थलों पर स्नान करने से होते हैं। यही वजह है कि पुराणों में भगवान नारायण को पाने का सुगम मार्ग माघ मास के पुण्य स्नान को बतलाया गया है।
माना जाता है कि माघ मेले के समय में संगम के तट पर देवताओं का वास होता है, इसलिए इस समय विशेष तिथियों पर यहां स्नान करने से देवताओं की खास कृपा प्राप्त होती है।
इस अवधि में जो कल्पवास कर जप-तप करते हैं उन्हें मोक्ष प्राप्ति होती है ऐसी मान्यता है। माघ मास में प्रात: स्नान आयु, आरोग्य, रूप, बल, सौभाग्य प्रदान करता है।

मेले का इतिहास
माघ मेला कुम्भ मेले का छोटा स्वरूप है। समुद्र मंथन के दौरान जब अमृत कलश को लेकर देवता और असुरों में छीना-झपटी हो रही थी तब अमृत की कुछ बूंदें उज्जैन, प्रयागराज, हरिद्वार और इलाहाबाद की पवित्र नदियों में गिरी थीं। यही वजह है कि माघ मेले के दौरान पवित्र नदियों में स्नान करने पर समस्त पाप कर्म दूर होते हैं और व्यक्ति अमृत तुल्य पुण्य पाता है।

हजारों वर्षों से पुण्यकर्म की अटूट श्रद्धा
इस मेले में केवल यह देखने और समझने के लिए भी कई लोग आते हैं कि कैसे हजारों वर्षों से इस धार्मिक एवं सांस्कृतिक आयोजन के प्रति लोगों की अटूट श्रद्धा बनी हुई है तथा इस मेले का संचालन इतना सुनियोजित एवं सुव्यवस्थित रूप से कैसे हो पाता है।
माघ मेले के दौरान कुछ छह विशिष्ट स्नान किए जाते हैं, जिनमें पहला विशिष्ट स्नान मकर संक्रांति को होता है, दूसरा विशिष्ट स्नान पौष पूर्णिमा को, तीसरा विशिष्ट स्नान मौनी अमावस्या को, चौथा वसंत पंचमी को, पांचवां माघ पूर्णिमा तथा छठा विशिष्ट स्नान महाशिवरात्रि को किया जाता है।

इस बार माघ के प्रमुख स्नान
3 जनवरी - पौष पूर्णिमा
14 जनवरी - मकर संक्रांति
18 जनवरी - मौनी अमावस्या
23 जनवरी - बसंत पंचमी
1 फरवरी - माघ पूर्णिमा
15 फरवरी - महाशिवरात्रि

कल्पवासी
मिनी कुम्भ कहलाने वाले इस धार्मिक और सांस्कृतिक मेले के महत्व का अनुमान इस बात से भी लगाया जा सकता है कि पूरे माघ मेले के दौरान लाखों साधक प्रयागराज में संगम के तट पर कुटिया बनाकर 45 दिनों तक ‘कल्पवास’ करते हैं। कल्पवास के दौरान भक्त सुबह-शाम संगम में विशिष्ट स्नान कर अधिकतम समय भगवान की पूजा-साधना में लीन रहते हैं।
शास्त्र बताते हैं कि माघ मेले में एक महीने तक कल्पवास करने से एक संपूर्ण ‘कल्प’ का पुण्यफल प्राप्त होता है। बताना आवश्यक है कि पृथ्वी पर का एक कल्प ब्रह्मदेव के एक दिन के बराबर और बह्मा जी का एक दिन 1000 महायुगों के बराबर होता है।
इस माघ मेले में कई तरह के यज्ञ किए जाते हैं। विविध प्रकार की प्रार्थनाएं की जाती हैं एवं अनगिनत अनुष्ठान भी संपन्न होते हैं। मेले के दौरान कल्पवास करने वाले साधकों को अपने मन और इंद्रियों को नियंत्रित करने की शक्ति प्राप्त होती है।
कल्पवास की परंपरा आदिकाल से चली आ रही है और इसके पीछे उद्देश्य इंसान की आत्म शुद्धि का रहा है। बताया जाता है कि संगम के तट पर एक महीने तक निवास करके वेदों का अध्ययन करने और ध्यान, योग आदि करने से व्यक्ति का मानस पूरी तरह से आध्यात्मिक हो जाता है।
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार कल्पवास के दौरान प्रयाग के संगम तट पर बह्मांड की सारी विशिष्ट शक्तियों का चुंबकीय प्रभाव मौजूद रहता है, जिसके कारण व्यक्ति का तन और मन ऊर्जा से लबालब भर जाता है।
