Edited By Prachi Sharma,Updated: 28 Jan, 2026 12:13 PM

एक साधारण व्यक्ति को शिव तत्व का अनुभव नहीं होता क्योंकि उसे इसकी आवश्यकता ही नहीं होती। एक सामान्य व्यक्ति अपना जीवन पांच इंद्रियों के पीछे भागने में बिता देता है, जो पांच मूल तत्वों और पांच मूल चक्रों से संबंधित हैं।
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एक साधारण व्यक्ति को शिव तत्व का अनुभव नहीं होता क्योंकि उसे इसकी आवश्यकता ही नहीं होती। एक सामान्य व्यक्ति अपना जीवन पांच इंद्रियों के पीछे भागने में बिता देता है, जो पांच मूल तत्वों और पांच मूल चक्रों से संबंधित हैं। गंध का नियंत्रण मूलाधार द्वारा, स्वाद का स्वाधिष्ठान द्वारा, दृष्टि का मणिपूरक द्वारा, स्पर्श का अनाहत द्वारा और ध्वनि का विशुद्धि द्वारा होता है। ये पांचों उन दैनिक सुखों के लिए पर्याप्त हैं, जिनमें व्यक्ति सुबह से रात तक लिप्त रहता है।
बुनियादी सुखों के अनुभव के लिए इससे आगे किसी भी चीज की आवश्यकता नहीं होती। जब कोई आवश्यकता ही नहीं होती, तो आगे देखने की प्रेरणा भी कम होती है और इसलिए एक साधारण व्यक्ति शिव तत्व से अनजान रहता है।
शिव पांच तत्वों से परे हैं, वे परतत्व हैं, जिनमें सभी तत्व निवास करते हैं। शिव के अनुभव के लिए योग के माध्यम से आज्ञा चक्र के जागरण की आवश्यकता होती है। आपको शक्तिपात द्वारा एक-दो बार अनुभव कराया जा सकता है, लेकिन जब तक आप अपनी बुनियादी इंद्रियों पर नियंत्रण नहीं कर लेते, जब तक आप आज्ञा अवस्था तक नहीं पहुंच जाते, तब तक यह आपको स्वाभाविक रूप से प्राप्त नहीं होगा। जब तक आप जीवन में हर चीज का मूल्यांकन इन पांच इंद्रियों से करते रहेंगे, तब तक आप इनसे ऊपर नहीं उठ पाएंगे। शिव को खोजने का विचार भी आपके मन में नहीं आएगा। भले ही शिव यहीं साक्षात् हों, फिर भी आप उन्हें देख नहीं पाएंगे क्योंकि वह दृष्टि मौजूद नहीं है, आपकी तीसरी आंख नहीं खुली है क्योंकि आप अन्य पांच इंद्रियों से बंधे हुए हैं।
शिव संपूर्ण ब्रह्मांड में विद्यमान हैं और संपूर्ण ब्रह्मांड शिव में समाहित है। योगी को शिव का साक्षात्कार प्राप्त होता है, योगी पांचों इंद्रियों और उनसे संबंधित सुखों के वश से परे होते हैं। साधारण मनुष्य एक या एक से अधिक मूलभूत इंद्रियों से बंधा होता है, जिसके कारण उसे यह अनुभव नहीं हो पाता। आइए इसे दैनिक जीवन के एक उदाहरण से समझते हैं। मान लीजिए आप एक पुरुष और एक स्त्री को हाथ पकड़कर चलते हुए देखते हैं। अनाहद अवस्था में रहने वाला व्यक्ति उन्हें भाई-बहन समझेगा, स्वाधिष्ठान अवस्था में रहने वाला व्यक्ति उन्हें प्रेमी-प्रेमिका समझेगा। आज्ञा अवस्था में रहने वाला योगी इसे शिव-शक्ति का संबंध कहेगा। वह शिव और शक्ति के सिवा कुछ नहीं देखेगा। शिव और शक्ति का मिलन ही सृजन है और उनका वियोग ही प्रलय है।
अश्विनी गुरुजी ध्यान आश्रम