Edited By Jyoti,Updated: 08 Aug, 2021 12:50 PM

बात उस समय की है जब अमर शहीद रामप्रसाद बिस्मिल पकड़ लिए गए। उन्हें कोतवाली लाया गया। वहां निगरानी रखने वाला सिपाही सो रहा था। बिस्मिल के पास भागने का पूरा मौका था। उन्होंने देखा कि
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बात उस समय की है जब अमर शहीद रामप्रसाद बिस्मिल पकड़ लिए गए। उन्हें कोतवाली लाया गया। वहां निगरानी रखने वाला सिपाही सो रहा था। बिस्मिल के पास भागने का पूरा मौका था। उन्होंने देखा कि वहां केवल एक बुजुर्ग मुंशी जी जाग रहे हैं।
बूढ़े मुंशी ने भांप लिया कि बिस्मिल भागने की सोच रहे हैं। वह तुरन्त बिस्मिल के पैरों में गिर कर बोला ऐसा न करना नहीं तो मैं बंदी बना लिया जाऊंगा और मेरे बच्चे भूखे मर जाएंगे। बिस्मिल को उन पर दया आ गई। उन्होंने भागने का विचार तत्काल त्याग दिया।
संयोगवश 2 दिन के बाद उन्हें ऐसा मौका दोबारा मिला। उन्हें जब शौचालय ले जाया गया तो उनके साथ दो सिपाही थे। एक ने दूसरे से कहा, ‘‘इनके हाथों में बंधी रस्सी हटा दो। मुझे विश्वास है कि यह भागेंगे नहीं।’’
जब बिस्मिल शौचालय में गए तो पाया कि शौचालय की दीवार ज्यादा ऊंची नहीं है। बस हाथ बढ़ाते ही वह दीवार के ऊपर हो जाते और क्षण भर में बाहर निकल जाते।
उन्होंने देखा कि बाहर सिपाही कुश्ती देखने में मग्न थे। वह भागने ही वाले थे कि उन्हें विचार आया कि जिस सिपाही ने विश्वास कर इतनी स्वतंत्रता उन्हें दी है, उससे विश्वासघात कैसे करूं।
उन्होंने भागने का विचार तुरंत त्याग दिया। उन्होंने अपनी आत्मकथा में जेलर पंडित चंपालाल की भी बहुत बढ़ाई की थी। उन्हें भागने के कई मौके हासिल हुए लेकिन उन्होंने सोचा कि इससे पंडित चंपालाल पर आफत आ जाएगी।
उनके लिए विश्वास की रक्षा सबसे बड़ी चीज थी। क्रांतिकारियों ने अपने जीवन में संकट के समय भी नैतिकता एवं ईमानदारी को अधिक महत्व दिया।