Edited By Prachi Sharma,Updated: 28 Feb, 2026 03:29 PM

Premanand Maharaj Pravachan : एक निजी संवाद में एक भक्त ने महाराज से प्रश्न किया कि जब भगवान सर्वज्ञ और अंतर्यामी हैं, तो क्या हमें अपनी इच्छाएं उनके सामने प्रकट करनी चाहिए या नहीं?
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Premanand Maharaj Pravachan : एक निजी संवाद में एक भक्त ने महाराज से प्रश्न किया कि जब भगवान सर्वज्ञ और अंतर्यामी हैं, तो क्या हमें अपनी इच्छाएं उनके सामने प्रकट करनी चाहिए या नहीं?
महाराज ने समझाया कि यदि किसी व्यक्ति को सचमुच यह अटल विश्वास है कि भगवान अंतर्यामी हैं और हमारे मन की हर भावना को जानते हैं, तो फिर अलग से मांगने या कामना करने की आवश्यकता ही नहीं रहती। जब वे सब कुछ जानते हैं, तो उन्हें बताने की जरूरत नहीं पड़ती।

लेकिन उन्होंने यह भी कहा कि यदि अभी हमारा विश्वास इतना दृढ़ नहीं है, तो भगवान से प्रार्थना करना गलत नहीं है। यदि मांगना ही है, तो केवल ईश्वर से मांगें, मनुष्यों से नहीं। सच्चे हृदय से की गई प्रार्थना व्यर्थ नहीं जाती। जो व्यक्ति धन, सुख या वैभव की इच्छा से भी भगवान का स्मरण करता है, उसकी कामनाएं भी प्रभु पूरी कर सकते हैं।
महाराज ने भक्ति के विभिन्न रूपों का भी उल्लेख किया। एक भक्त वह है जो किसी इच्छा की पूर्ति के लिए भगवान को पुकारता है। दूसरा वह जो जिज्ञासु है और भगवान के स्वरूप को जानना चाहता है। तीसरा ज्ञानी भक्त होता है, जो स्वयं को ईश्वर से अभिन्न अनुभव करता है।

अंत में उन्होंने कहा कि चाहे हमें धन चाहिए या कोई और इच्छा हो, उसे भी भगवान से ही मांगना चाहिए। ईश्वर या तो ऐसा ज्ञान प्रदान कर देते हैं कि सांसारिक इच्छाएं स्वतः समाप्त हो जाएं, या फिर ऐसी व्यवस्था कर देते हैं कि हमारी चाह शांत हो जाए। पर यदि विश्वास पूर्ण हो कि भगवान हमारे अंतर्मन को जानते हैं, तो फिर अलग से कुछ मांगने की आवश्यकता नहीं रह जाती।
