Edited By Sarita Thapa,Updated: 17 Jan, 2026 03:42 PM

महान दार्शनिक कन्फ्यूशियस के विद्वान शिष्य चांग हो एक बार दुनिया का भ्रमण करने निकले। जब वह पड़ोसी देश पहुंचे तो वहां के गांव में उन्होंने एक विशाल हरे-भरे बगीचे में किसान को कुएं से पानी भरकर पेड़ों को सींचते देखा।
Motivational Story : महान दार्शनिक कन्फ्यूशियस के विद्वान शिष्य चांग हो एक बार दुनिया का भ्रमण करने निकले। जब वह पड़ोसी देश पहुंचे तो वहां के गांव में उन्होंने एक विशाल हरे-भरे बगीचे में किसान को कुएं से पानी भरकर पेड़ों को सींचते देखा। उसके माथे से पसीना चो रहा था और सांस भी तेज चल रही थी। उसके चेहरे से साफ था कि वह प्रसन्न है लेकिन चांग हो को उस पर दया आ गई। उन्होंने पास ही मौजूद सूखे वृक्ष के तने से कुएं से पानी निकालने के लिए ‘उपकरण’ बना दिया। फिर उन्होंने अपने साथ चल रहे लोगों से कह कर पानी पेड़ों तक पहुंचाने के लिए नालियां बनवा दीं।
इसके बाद वह किसान को बेहतर जीवन जीने का संदेश देकर वहां से निकल पड़े। 4 साल बाद भ्रमण करते वह दोबारा वहां पहुंचे तो पाया कि पेड़ सूखे हैं और कुएं के पास भी कोई मौजूद नहीं है। वह किसान का पता पूछते हुए पास ही मौजूद झोंपड़ी में गए तो देखा किसान वहीं मौजूद है। उसके चेहरे से श्रम का सौंदर्य गायब था। वह बीमार दिख रहा था और खाट पर पड़ा था।
चांग हो ने अचरज ने पूछा, ‘‘मैंने तो तुम्हें समय और मेहनत की बचत करने की राह सुझाई थी, पर तुम्हारी क्या हालत हो गई है।’’
किसान की पत्नी ने तब कहा, ‘‘महाशय, आपकी सुझाई राह से ही तो यह हालत हुई है, क्योंकि मेहनत कम होते ही यह आलस्य से घिर गए। अब यह बैठे-बैठे बेकार की बातें सोचते रहते हैं और बीमार रहते हैं।’’
यह सुनकर चांग को अपनी गलती का एहसास हुआ। उन्होंने जीवन की एक बड़ी सीख हासिल की। वह यह कि तंदुुरुस्ती और प्रसन्नता के लिए शारीरिक श्रम जरूरी है और श्रम से मिलने वाले आनंद का कोई और विकल्प नहीं है। इसके बाद उन्होंने किसी भी काम को सरलता से करने का संदेश देना छोड़ दिया।
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