ब्रह्मा के मन से कैसे पैदा हुए नारद मुनि ? पढ़िए उनके मानस पुत्र बनने की अलौकिक कथा

Edited By Updated: 15 Jan, 2026 02:07 PM

narada muni birth story

भारतीय पौराणिक इतिहास में नारद मुनि एक ऐसे विलक्षण व्यक्तित्व हैं, जिनकी उपस्थिति मात्र से कथाओं में नया मोड़ आ जाता है। उन्हें केवल देवताओं का संदेशवाहक कहना पर्याप्त नहीं होगा, बल्कि वे ज्ञान, भक्ति और संगीत के साक्षात स्वरूप हैं।

Narada Muni Birth Story : भारतीय पौराणिक इतिहास में नारद मुनि एक ऐसे विलक्षण व्यक्तित्व हैं, जिनकी उपस्थिति मात्र से कथाओं में नया मोड़ आ जाता है। उन्हें केवल देवताओं का संदेशवाहक कहना पर्याप्त नहीं होगा, बल्कि वे ज्ञान, भक्ति और संगीत के साक्षात स्वरूप हैं। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि हाथ में वीणा और मुख पर नारायण-नारायण का जाप करने वाले इस महान ऋषि का प्राकट्य कैसे हुआ। अक्सर हम शरीर से जन्म लेने वाली संतानों के बारे में जानते हैं, परंतु देवर्षि नारद का अस्तित्व किसी भौतिक देह से नहीं, बल्कि सृष्टि के रचयिता भगवान ब्रह्मा के संकल्प और उनके मन से उत्पन्न हुआ है। यही कारण है कि उन्हें ब्रह्मा जी का मानस पुत्र होने का गौरव प्राप्त है। नारद मुनि का जन्म केवल एक दैवीय घटना नहीं, बल्कि ब्रह्मांडीय चेतना के विस्तार की एक अलौकिक प्रक्रिया थी। एक ऐसा पुत्र, जिसने जन्म लेते ही संसार के बंधनों को त्यागकर भक्ति के मार्ग को चुना। आखिर ब्रह्मा जी के मन में ऐसा क्या विचार आया कि नारद का जन्म हुआ और एक दासी-पुत्र से देवर्षि बनने तक का उनका वह रहस्यमयी सफर क्या था। तो आइए जानते हैं नारद मुनि के मानस पुत्र बनने की वह प्राचीन कथा के बारे में-

Narada Muni Birth Story

मानस पुत्र का अर्थ क्या है ?
मानस पुत्र का अर्थ है वह संतान जिसकी उत्पत्ति शरीर से नहीं, बल्कि केवल संकल्प और मन की शक्ति से हुई हो। जब ब्रह्मा जी ने सृष्टि की रचना के दौरान अपने मन को एकाग्र किया, तब उनके मन के संकल्प से एक तेजस्वी बालक का प्राकट्य हुआ, जिन्हें हम नारद मुनि के नाम से जानते हैं।

नारद के जन्म की अलौकिक कथा
पौराणिक कथाओं के अनुसार, जब ब्रह्मा जी सृष्टि का निर्माण कर रहे थे, तो उन्हें ऐसे सहायकों की आवश्यकता थी जो संसार के नियमों और ज्ञान का प्रसार कर सकें। ब्रह्मा जी के अलग-अलग अंगों से अलग-अलग ऋषियों का जन्म हुआ, लेकिन जब उन्होंने अपने मन का उपयोग किया, तब वीणा धारण किए हुए नारद प्रकट हुए। जन्म लेते ही नारद मुनि ने भगवान विष्णु की भक्ति में लीन होने का संकल्प लिया। हालांकि, प्रारंभ में ब्रह्मा जी चाहते थे कि नारद सृष्टि के विस्तार में मदद करें, लेकिन नारद का मन केवल हरि-भक्ति में रमा था। 

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महापुराण के अनुसार, मानस पुत्र बनने से पहले नारद अपने पूर्व जन्म में एक दासी पुत्र थे। अपनी माता के साथ रहते हुए उन्होंने संतों की सेवा की और उनके द्वारा छोड़े गए भोजन को ग्रहण किया। संतों की संगति से उन्हें ईश्वर के वास्तविक स्वरूप का ज्ञान हुआ। माता की मृत्यु के बाद वे वन में चले गए और घोर तपस्या की। उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान ने उन्हें दर्शन दिए और आशीर्वाद दिया कि अगले कल्प में वे उनके पार्षद और ब्रह्मा के मानस पुत्र के रूप में जन्म लेंगे।

नारद मुनि का महत्व
नारद मुनि केवल एक संदेशवाहक नहीं हैं, बल्कि वे भक्ति सूत्र के रचयिता भी हैं। वे देवताओं और असुरों, दोनों के बीच समान रूप से पूजनीय हैं क्योंकि उनका हर कार्य अंततः धर्म की स्थापना और जगत के कल्याण के लिए होता है।

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