Shattila Ekadashi 2026: षटतिला एकादशी की कथा के साथ जानें, तिल के 6 विधान की पूरी जानकारी

Edited By Updated: 12 Jan, 2026 02:11 PM

shattila ekadashi 2026

Shattila Ekadashi Vrat 2026 Date: षटतिला एकादशी 2026 माघ मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि को मनाई जाएगी। पंचांग के अनुसार वर्ष 2026 में यह पावन एकादशी 14 जनवरी 2026 (बुधवार) को पड़ेगी। हिंदू धर्म में एकादशी व्रत को भगवान विष्णु की आराधना, आत्मशुद्धि...

Shattila Ekadashi Vrat 2026 Date: षटतिला एकादशी 2026 माघ मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि को मनाई जाएगी। पंचांग के अनुसार वर्ष 2026 में यह पावन एकादशी 14 जनवरी 2026 (बुधवार) को पड़ेगी। हिंदू धर्म में एकादशी व्रत को भगवान विष्णु की आराधना, आत्मशुद्धि और पाप नाश का सर्वोत्तम साधन माना गया है। माघ मास स्वयं तप, संयम और सात्विक जीवन का प्रतीक है। ऐसे में माघ कृष्ण पक्ष की यह एकादशी विशेष पुण्यफल प्रदान करने वाली मानी जाती है। शास्त्रों में इस व्रत को केवल उपवास तक सीमित नहीं रखा गया, बल्कि दान, त्याग और सामाजिक कर्तव्य से भी जोड़ा गया है।

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Maagh Maas Ekadashi: षटतिला एकादशी का धार्मिक महत्व
माघ मास की एकादशी को षटतिला एकादशी कहा जाता है, क्योंकि इस दिन तिल का छह प्रकार से प्रयोग करने का विधान शास्त्रों में बताया गया है। संस्कृत में षट का अर्थ छह और तिला का अर्थ तिल होता है। इन्हीं छह कर्मों के कारण यह एकादशी अन्य एकादशियों से अलग और विशेष मानी जाती है।

धार्मिक मान्यता है कि इस व्रत को श्रद्धा और नियमपूर्वक करने से धन-धान्य की कभी कमी नहीं रहती, दरिद्रता दूर होती है और व्यक्ति को भौतिक व आध्यात्मिक दोनों स्तरों पर संतुलन प्राप्त होता है।

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Shattila Ekadashi 2026: तिल के छह विधान क्या हैं?
शास्त्रों के अनुसार षटतिला एकादशी पर तिल का निम्न छह प्रकार से प्रयोग किया जाता है—
तिल से स्नान – शारीरिक और मानसिक शुद्धि के लिए
तिल का उबटन – दोष नाश और आरोग्य के लिए
तिल से तर्पण – पितरों की शांति के लिए
तिल का हवन – वातावरण और आत्मा की शुद्धि के लिए
तिल का दान – दरिद्रता, रोग और कष्ट निवारण हेतु
तिल का सेवन – स्वास्थ्य और ऊर्जा के लिए

इन छह कर्मों को विधिपूर्वक करने से व्रत का पूर्ण फल प्राप्त होता है।

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शास्त्रों में तिल का महत्व
पद्म पुराण और भविष्य पुराण में तिल को अत्यंत पवित्र और पाप नाशक बताया गया है। मान्यता है कि तिल भगवान विष्णु के शरीर से उत्पन्न हुए हैं, इसलिए विष्णु पूजा और एकादशी व्रत में तिल का विशेष महत्व है।

शीत ऋतु में तिल को अग्नि तत्व का प्रतीक माना गया है, जो शरीर को ऊष्मा, ऊर्जा और मन को स्थिरता प्रदान करता है। तिल से किया गया दान न केवल पुण्यदायी होता है, बल्कि सामाजिक और मानवीय दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण माना गया है।

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Shattila Ekadashi Katha: षटतिला एकादशी की पौराणिक कथा
षटतिला एकादशी से जुड़ी एक प्रसिद्ध कथा शास्त्रों में वर्णित है। कथा के अनुसार, एक ब्राह्मण स्त्री नियमित रूप से व्रत, पूजा और तप करती थी, लेकिन उसने अपने जीवन में कभी अन्न या तिल का दान नहीं किया।

मृत्यु के बाद उसे स्वर्ग तो प्राप्त हुआ, लेकिन वहां उसका निवास रिक्त और साधनहीन था। जब उसने भगवान विष्णु से इसका कारण पूछा, तो प्रभु ने बताया कि दान के अभाव में उसका पुण्य अधूरा रह गया।

भगवान विष्णु की आज्ञा से उसने पुनः पृथ्वी पर आकर षटतिला एकादशी का व्रत किया और तिल का विधिपूर्वक दान किया। इसके प्रभाव से उसका स्वर्ग लोक वैभव, सुख और समृद्धि से परिपूर्ण हो गया। तभी से यह एकादशी पूर्ण पुण्य, दान और त्याग का प्रतीक मानी जाती है।

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षटतिला एकादशी व्रत का फल
धन-धान्य और समृद्धि में वृद्धि
पापों का नाश और आत्मशुद्धि
पितृ दोष से मुक्ति
रोग, कष्ट और नकारात्मक ऊर्जा से रक्षा
भगवान विष्णु की विशेष कृपा

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