Srimad Bhagavad Gita: श्रीमद्‍भगवद्‍गीता से जानें, संन्यास और त्याग का रहस्य

Edited By Updated: 02 Mar, 2025 07:51 AM

srimad bhagavad gita

भगवान श्री कृष्ण द्वारा अर्जुन को कुरुक्षेत्र की भूमि पर प्रदान किए गए अद्भुत दिव्य श्री गीता ज्ञान उपदेश के रूप में कहे गए 17 अध्यायों के उपसंहार को 18वें अध्याय के रूप में कहा गया है

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Srimad Bhagavad Gita: भगवान श्री कृष्ण द्वारा अर्जुन को कुरुक्षेत्र की भूमि पर प्रदान किए गए अद्भुत दिव्य श्री गीता ज्ञान उपदेश के रूप में कहे गए 17 अध्यायों के उपसंहार को 18वें अध्याय के रूप में कहा गया है। जिस प्रकार अर्जुन पांचवें अध्याय में संन्यास और कर्म योग में अंतर नहीं कर पा रहे थे, तब भगवान ने अर्जुन को समझाया था कि जिसे तुम संन्यास समझते हो, उसी को योग जानो।

इसी प्रश्न को दोहराते हुए अर्जुन 18वें अध्याय में फिर पूछते हैं कि प्रभु मैं संन्यास और त्याग का रहस्य समझना चाहता हूं।

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यहां भगवान स्पष्ट शब्दों में समझाते हैं कि यज्ञ, दान, तप आदि काम्य कर्मों को त्यागने वाले मत के विद्वान लोग ऐसा कहते हैं कि सभी कर्म दोषयुक्त होते हैं इसलिए कर्मों को स्वरूप से त्यागना ही संन्यास है। कुछ विद्वानों का मत है कि यज्ञ, दान तथा तप आदि कर्म त्यागने योग्य नहीं हैं। भगवान अपना निश्चित तथा उत्तम मत प्रदान करते हुए कहते हैं कि ये कर्म त्यागने योग्य नहीं बल्कि आवश्यक हैं।  

मनुष्य द्वारा सम्पूर्णता से सब कर्मों का त्याग करना संभव नहीं है। संन्यास कर्मों के परित्याग का नाम नहीं है। जो मनुष्य कर्म फल का आश्रय न लेकर करने योग्य कर्म करता है, वही संन्यासी तथा योगी है।

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जो मनुष्य कर्म फल का त्याग नहीं करते, मरने के पश्चात उनके कर्मों का फल-अच्छा, बुरा और मिला हुआ-ऐसे 3 प्रकार का होता है परन्तु संन्यास रूपी निष्काम कर्म योग का आचरण करने वाले मनुष्यों के कर्मों का फल किसी भी काल में नहीं होता। जिस पुरुष के अंत:करण में कर्तापन का भाव नहीं है तथा जिसकी बुद्धि सांसारिक पदार्थों में लिपायमान नहीं होती, वह पाप से नहीं बंधता।

भगवान श्री कृष्ण द्वारा अर्जुन को कुरुक्षेत्र की भूमि पर प्रदान किए गए अद्भुत दिव्य श्री गीता ज्ञान उपदेश के रूप में कहे गए 17 अध्यायों के उपसंहार को 18वें अध्याय के रूप में कहा गया है

अपने-अपने स्वाभाविक कर्मों से कर्तव्य मार्ग पर प्रवृत्त हुआ मनुष्य, जिस परमेश्वर से संसार की उत्पत्ति हुई है, को पूज कर परम सिद्धि प्राप्त कर लेता है।
भगवान कहते हैं कि ऐसा समत्व भाव को प्राप्त योगी मेरी पराभक्ति प्राप्त कर लेता है और भगवान के परायण कर्त्तव्य कर्मों को करता हुआ अविनाशी परम पद को प्राप्त कर लेता है। इसलिए सब कर्मों को मन से मुझे अर्पण कर। इस प्रकार मुझ में चित्त वाला होकर तू समस्त संकटों को अनायास ही पार कर जाएगा। अगर अहंकार पूर्वक मेरे इन वचनों को तू नहीं सुनेगा तो कल्याण मार्ग से भ्रष्ट हो जाएगा।

भगवान अर्जुन को  कर्तव्य और अकर्तव्य रूपी भंवर से निकालने के लिए सम्पूर्ण प्राणी मात्र के कल्याण के उद्देश्य से यह वचन कहते हैं कि अगर तेरी बुद्धि धर्म के विषय में निर्णय लेने में अभी भी तैयार नहीं है तो तू सम्पूर्ण धर्म अर्थात कर्तव्य कर्मों के निर्णयों का त्याग कर मुझ एक (सर्वशक्तिमान परमेश्वर) की शरण में आ जा। मैं तुझे सभी पापों से मुक्त कर दूंगा।

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यही भगवद् गीता का सार है। यही कर्म संन्यास है, यही कर्म योग है, यही सांख्य योग है, यही भक्ति योग है। यह ज्ञान की पराकाष्ठा है क्योंकि सभी कर्म भगवान को ही अर्पित होते हैं। ऐसे भाव से जो भक्त भगवान की पूजा करता है, भगवान को प्रणाम करता है, वह भगवान को सहज भाव से ही प्राप्त कर लेता है।
श्री गीता का पठन-पाठन करने से भगवान ज्ञान यज्ञ से पूजित होते हैं। इस प्रकार भगवान के दिव्य रहस्यपूर्ण गीता ज्ञान से अर्जुन की बुद्धि संशय रहित हो ज्ञान योग में स्थित हो गई।

इस अध्याय में भगवान ने बताया कि संन्यास के वास्तविक स्वरूप को समझने वाली बुद्धि ही मोक्ष के योग्य होती है, अत: इसका नामकरण मोक्ष सन्यास योग हुआ।     

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