Vinayak Chaturthi Vrat Katha 2026 : विनायक चतुर्थी की कथा में छिपा है सुख-शांति का रहस्य, पढ़िए पूरी कथा

Edited By Updated: 21 Jan, 2026 01:45 PM

vinayak chaturthi vrat katha 2026

Vinayak Chaturthi Vrat Katha 2026 :  हिन्दू पंचांग के अनुसार, माघ मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि को विनायक चतुर्थी मनाई जाती है। साल 2026 की पहली विनायक चतुर्थी 22 जनवरी को पड़ रही है। इस तिथि का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि इसे गणेश जयंती...

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Vinayak Chaturthi Vrat Katha 2026 :  हिन्दू पंचांग के अनुसार, माघ मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि को विनायक चतुर्थी मनाई जाती है। साल 2026 की पहली विनायक चतुर्थी 22 जनवरी को पड़ रही है। इस तिथि का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि इसे गणेश जयंती के रूप में भी मनाया जाता है, जिसे भगवान गणेश के जन्म का दिन माना जाता है। आइए जानते हैं विनायक चतुर्थी 2026 की तिथि, पूजा का शुभ मुहूर्त और इस दिन चंद्रदर्शन वर्जित क्यों है।

Puja Vidhi पूजा विधि
सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और लाल या पीले रंग के स्वच्छ वस्त्र धारण करें। हाथ में जल लेकर व्रत का संकल्प लें।

पूजा के स्थान पर लाल कपड़ा बिछाकर भगवान गणेश की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें।

बप्पा को जल, अक्षत, चंदन, सिंदूर, और लाल फूल अर्पित करें।

गणेश जी को 21 दूर्वा की गांठें अर्पित करना बहुत शुभ होता है।

विनायक चतुर्थी व्रत कथा का पाठ करें और अंत में कपूर से गणेश जी की आरती उतारें।

Vinayak Chaturthi Vrat Katha विनायक चतुर्थी व्रत कथा 

एक बार एक बालक से अनजाने में एक बड़ी भूल हो गई। उसके इस गलत निर्णय से माता पार्वती अत्यंत क्रोधित हो गईं और उन्होंने उसे लंगड़ा होने तथा कीचड़ में जीवन बिताने का श्राप दे दिया। अपनी भूल का एहसास होते ही बालक ने माता के चरणों में गिरकर क्षमा याचना की और विनम्रता से कहा कि उससे यह गलती अज्ञानवश हो गई है।

माता पार्वती ने समझाया कि दिया गया श्राप वापस नहीं लिया जा सकता, लेकिन उन्होंने उसे मुक्ति का मार्ग अवश्य बताया। माता ने कहा कि भविष्य में उस स्थान पर नागकन्याएं गणेश पूजन के लिए आएंगी। उनके बताए अनुसार यदि वह विधिपूर्वक गणेश व्रत करे, तो इस व्रत के प्रभाव से उसकी पीड़ा समाप्त हो जाएगी।

एक वर्ष बाद नागकन्याएं वहां पूजा के लिए आईं। बालक ने उनसे गणेश व्रत की पूरी विधि जानी और फिर पूरे विश्वास के साथ 21 दिनों तक लगातार भगवान गणेश का व्रत किया। उसकी भक्ति और तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान गणेश स्वयं प्रकट हुए। बालक ने उनसे प्रार्थना की कि उसे इतनी शक्ति प्रदान करें जिससे वह अपने पैरों पर चलकर कैलाश पर्वत तक पहुंच सके। गणेश जी ने उसे श्राप से मुक्त कर दिया और वह पूर्ण रूप से स्वस्थ हो गया।

इसके बाद वह बालक कैलाश पर्वत पहुंचा और वहां भगवान शिव को अपने जीवन की पूरी कथा सुनाई।

उधर, चौपड़ के दिन से माता पार्वती भगवान शिव से रुष्ट थीं। उन्हें मनाने के लिए स्वयं भगवान शिव ने भी गणेश व्रत का पालन किया। इस व्रत के प्रभाव से माता पार्वती का मन स्वतः ही पिघल गया और वे शिवजी से मिलने चल पड़ीं। जब वे कैलाश पहुंचीं तो उन्होंने आश्चर्य से पूछा कि ऐसा कौन-सा कारण है, जिसने उन्हें बिना किसी प्रयास के शिवजी की ओर खींच लिया।

तब भगवान शंकर ने उन्हें गणेश व्रत की महिमा के बारे में बताया।

बाद में माता पार्वती ने अपने पुत्र कार्तिकेय से पुनः मिलने की इच्छा से भी यह व्रत किया। व्रत के इक्कीसवें दिन कार्तिकेय स्वयं अपनी माता से मिलने आए। मान्यता है कि जो भी व्यक्ति सच्ची श्रद्धा और विश्वास के साथ यह व्रत करता है, उसकी सभी मनोकामनाएं अवश्य पूर्ण होती हैं।

 

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