Edited By Tanuja,Updated: 23 Feb, 2026 02:49 PM

अमेरिका ने राइली एम. बार्न्स को तिब्बती मुद्दों के विशेष समन्वयक नियुक्त किया, जिस पर चीन ने कड़ी आपत्ति जताई। बीजिंग ने इसे आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप बताया। अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रूबियो ने लोसार पर तिब्बती मानवाधिकार और धार्मिक स्वतंत्रता...
Bejing: तिब्बत मुद्दे को लेकर चीन और अमेरिका के बीच एक बार फिर तनाव बढ़ गया है। अमेरिकी विदेश मंत्री Marco Rubio ने Riley M. Barnes को तिब्बती मुद्दों के लिए अमेरिका का नया विशेष समन्वयक (स्पेशल कोऑर्डिनेटर) नियुक्त किया है। बार्न्स वर्तमान में अमेरिकी विदेश विभाग में लोकतंत्र, मानवाधिकार और श्रम मामलों के सहायक विदेश मंत्री के रूप में कार्यरत हैं। यह घोषणा तिब्बती नववर्ष लोसार के अवसर पर की गई। रूबियो ने दुनिया भर के तिब्बतियों को शुभकामनाएं देते हुए कहा कि अमेरिका तिब्बतियों के मानवाधिकार, धार्मिक स्वतंत्रता, सांस्कृतिक पहचान और भाषा संरक्षण के लिए प्रतिबद्ध है।
उन्होंने अपने संदेश में “Losar Tashi Delek” कहकर तिब्बती समुदाय के प्रति समर्थन जताया।चीन के विदेश मंत्रालय ने इस नियुक्ति पर कड़ी आपत्ति जताई। बीजिंग ने कहा कि तथाकथित “स्पेशल कोऑर्डिनेटर” का पद चीन के आंतरिक मामलों में दखल देने का माध्यम है और चीन ने कभी भी इस पद की वैधता को मान्यता नहीं दी है। चीन ने दोहराया कि तिब्बत से जुड़े सभी मुद्दे उसकी संप्रभुता के दायरे में आते हैं और किसी भी बाहरी हस्तक्षेप की अनुमति नहीं दी जाएगी।
क्या है स्पेशल कोऑर्डिनेटर का काम ?
अमेरिका में यह पद Tibetan Policy Act के तहत 2002 में बनाया गया था। यह कानून तत्कालीन प्रशासन द्वारा पारित किया गया था, जिसके तहत विदेश मंत्री को तिब्बती मुद्दों के लिए एक विशेष समन्वयक नियुक्त करना अनिवार्य है।इस पद का उद्देश्य चीनी सरकार और Dalai Lama या उनके प्रतिनिधियों के बीच सार्थक संवाद को प्रोत्साहित करना, तिब्बतियों के मानवाधिकार और धार्मिक स्वतंत्रता की रक्षा, तिब्बती भाषा और संस्कृति का संरक्षण, दक्षिण एशिया में तिब्बती शरणार्थियों को मानवीय सहायता करना है।
यह पद बीजिंग में राजनयिक प्रतिनिधि नहीं होता, बल्कि अमेरिकी नीति समन्वय का दायित्व निभाता है।विश्लेषकों का मानना है कि यह कदम ऐसे समय आया है जब चीन और अमेरिका के बीच पहले से ही कई मुद्दों पर तनाव बना हुआ है जैसे ताइवान, व्यापार और मानवाधिकार। तिब्बत का मुद्दा लंबे समय से दोनों देशों के बीच संवेदनशील रहा है। जहां अमेरिका मानवाधिकार और धार्मिक स्वतंत्रता की बात करता है, वहीं चीन इसे अपनी संप्रभुता का मामला मानता है।