आदिवासी गांव बना 'डॉक्टरों की नर्सरी', महाराष्ट्र के इस गांव ने 10 साल में दिए 13 डॉक्टर

Edited By Updated: 10 Aug, 2026 02:14 PM

a tribal village has become a  nursery of doctors  this maharashtra village has

यह कहानी उन तमाम लोगों के लिए मिसाल है, जो मुश्किल हालात के आगे अपने सपनों को छोड़ देते हैं। सुविधाओं की कमी से कई छात्र पढ़ाई बीच में छोड़ने को मजबूर हो जाते हैं, लेकिन कुछ ऐसे भी होते हैं जो हालात से समझौता नहीं करते।

महाराष्ट्र: यह कहानी उन तमाम लोगों के लिए मिसाल है, जो मुश्किल हालात के आगे अपने सपनों को छोड़ देते हैं। सुविधाओं की कमी से कई छात्र पढ़ाई बीच में छोड़ने को मजबूर हो जाते हैं, लेकिन कुछ ऐसे भी होते हैं जो हालात से समझौता नहीं करते। जब मंजिल पाने की जिद दिल में हो, तो रास्ते की लाख चुनौतियां भी हौसला नहीं तोड़ पातीं और आखिरकार मेहनत व दृढ़ संकल्प इंसान को उसकी मंजिल तक पहुंचा ही देते हैं। ऐसी एक घटना महाराष्ट्र से आई है जहां पर आदिवासी गांव 'डॉक्टरों की नर्सरी' बन गया, यहां पर 10 साल में 13 लोग डॉक्टर बन हैं। 

10 साल में गांव से 13 डॉक्टर बने
दरअसल, महाराष्ट्र-मध्य प्रदेश सीमा पर बसे धुले जिले के 450 की आबादी वाले आदिवासी बहुल गांव 'गुर्हाडपानी' में न पक्की सड़क है, न 24 घंटे बिजली न ही यहां पर मोबाइल का नेटवर्क भी ठीक मिलता, लेकिन यहां डॉक्टर बहुत मिलते हैं। 10 साल में गांव से 13 डॉक्टर बने हैं। हाल ही में हुई 'नीट' में भी इस गांव के 3 छात्र अच्छे नंबर लाए हैं। कभी 100% की तस्वीर बदलने का श्रेय 2016 में गांव निरक्षरता का ठप्पा झेलने वाले इस गांव के पहले डॉक्टर बने डॉ. जगदीश पावरा को जाता है। वे इस आदिवासी इलाके से पहले 'एम.डी. रेडियोलॉजिस्ट' बने। डॉ. जगदीश ने गाइड किया और गांव के अन्य युवाओं ने भी मेडिकल की राह चुनी।

पड़ोस के गांव के बच्चे भी नीट और जेईई की तैयारी कर रहे
गांव के कई युवाओं के डॉक्टर बनने से पूरे गांव में शिक्षा का स्तर बढ़ गया है। यहां से प्रेरणा लेकर पड़ोसी गांव 'सीतारपाड़ा' के युवा भी बड़ी संख्या में नीट और जेईई जैसी कठिन परीक्षाओं की तैयारी कर रहे हैं।

लड़कियों को समान अवसर और आईआईटी में भी दाखिला
गांव की 3 लड़कियां डॉक्टर बन चुकी हैं। इस साल भी एक लड़की पास हुई है। भूषण पावरा (आईआईटी मणिपुर) और मुकेश पावरा (आईआईटी गुवाहाटी) पहुंचे हैं।

झोपड़ी में शुरू की लाइब्रेरी, मुफ्त किताबें मुहैया कराईं
संस्था 'यंग फाउंडेशन' ने गांव की झोपड़ी में लाइब्रेरी बनाई। यहीं 'नीट' परीक्षा के लिए महंगी किताबें और बेंच की सुविधा उपलब्ध कराई। इस मदद से बच्चों की मेहनत जल्दी रंग लाई और हर साल डॉक्टर बनने लगे। डॉ. जगदीश पावरा ने बताया बचपन से आश्रम शाला में पढ़ाई की। 2016 में डॉक्टर बनने का सपना पूरा हुआ। गांव का पहला एम.डी. डॉक्टर बनने की खुशी है। अब गांव के बच्चों को जितना संभव हो सके मुफ्त मार्गदर्शन देता हूं। 

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