Edited By Ramkesh,Updated: 05 Aug, 2026 02:56 PM

कलकत्ता उच्च न्यायालय ने तृणमूल कांग्रेस के नेता अभिषेक बनर्जी की वह याचिका बुधवार को खारिज कर दी जिसमें उन्होंने आंख के इलाज के लिए विदेश जाने की अनुमति मांगी थी। अदालत ने इससे पहले बनर्जी को इस मामले में चिकित्सकीय राय के लिए छह अगस्त को सरकारी...
नेशनल डेस्क: कलकत्ता उच्च न्यायालय ने तृणमूल कांग्रेस के नेता अभिषेक बनर्जी की वह याचिका बुधवार को खारिज कर दी जिसमें उन्होंने आंख के इलाज के लिए विदेश जाने की अनुमति मांगी थी। अदालत ने इससे पहले बनर्जी को इस मामले में चिकित्सकीय राय के लिए छह अगस्त को सरकारी एसएसकेएम अस्पताल के चिकित्सकीय बोर्ड के समक्ष उपस्थित होने की सलाह दी थी।
चिकित्सकीय बोर्ड के समक्ष पेश नहीं हुए अभिषेक बनर्जी
हालांकि, टीएमसी नेता ने अदालत को बताया कि वह चिकित्सकीय बोर्ड के समक्ष पेश होने के लिए तैयार नहीं हैं। इसके बाद अदालत ने विदेश जाने की उनकी याचिका खारिज कर दी। अदालत ने कहा कि एसएसकेएम अस्पताल के चिकित्सकों के समक्ष बनर्जी की उपस्थिति आवश्यक है, ताकि उनके स्वास्थ्य की जांच कर पीठ के समक्ष यह राय दी जा सके कि क्या उनके लिए विदेश जाकर इलाज कराना जरूरी है या भारत में ही उपचार संभव है।
अनुमति के बिना भारत नहीं छोड़ सकते बनर्जी
पीठ ने कहा कि इस समय सबसे महत्वपूर्ण बात याचिकाकर्ता का उपचार है। उपचार कहां होगा, यह महत्वपूर्ण नहीं है। इससे पहले एक आपराधिक मामले में अंतरिम संरक्षण देते हुए उच्च न्यायालय ने निर्देश दिया था कि बनर्जी अदालत की अनुमति के बिना भारत नहीं छोड़ सकते। इस आदेश को चुनौती देते हुए बनर्जी ने उच्चतम न्यायालय का रुख किया था। उच्चतम न्यायालय ने तीन अगस्त को उच्च न्यायालय से उनकी विदेश यात्रा की अनुमति संबंधी याचिका पर शीघ्र निर्णय लेने को कहा था।
आपराधिक मामले लंबित होने का दिया हवाला
राज्य सरकार की ओर से अतिरिक्त महाधिवक्ता राजदीप मजूमदार ने बनर्जी की याचिका का विरोध करते हुए कहा कि उनके खिलाफ कई आपराधिक मामले लंबित हैं और ऐसी कोई आपात चिकित्सकीय स्थिति नहीं है, जिसके लिए विदेश जाकर इलाज कराना आवश्यक हो। उन्होंने यह भी कहा कि बनर्जी के खिलाफ दर्ज कई प्राथमिकी में भी जांच जारी है और ऐसे में देश में उनकी उपस्थिति आवश्यक हो सकती है। बनर्जी की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता रेबेका जॉन ने दलील दी कि उपचार के लिए चिकित्सक और चिकित्सा संस्थान का चयन करना प्रत्येक व्यक्ति का अधिकार है, विशेष रूप से तब जब इलाज की निरंतरता का प्रश्न हो।