Edited By Anu Malhotra,Updated: 19 Mar, 2026 07:59 PM

केंद्र सरकार के लाखों कर्मचारियों और पेंशनभोगियों के लिए 8वें वेतन आयोग के गठन के साथ ही उम्मीदें और विवाद दोनों ही परवान चढ़ने लगे हैं। हाल ही में इंडियन रेलवे टेक्निकल सुपरवाइजर्स एसोसिएशन (IRTSA) ने आयोग की कार्यप्रणाली पर कड़े सवाल खड़े करते हुए एक...
नई दिल्ली: केंद्र सरकार के लाखों कर्मचारियों और पेंशनभोगियों के लिए 8वें वेतन आयोग के गठन के साथ ही उम्मीदें और विवाद दोनों ही परवान चढ़ने लगे हैं। हाल ही में इंडियन रेलवे टेक्निकल सुपरवाइजर्स एसोसिएशन (IRTSA) ने आयोग की कार्यप्रणाली पर कड़े सवाल खड़े करते हुए एक नया मोर्चा खोल दिया है। संगठन का मानना है कि आयोग द्वारा जारी की गई मौजूदा प्रश्नावली न केवल आधी-अधूरी है, बल्कि यह कर्मचारियों की बुनियादी जरूरतों और तकनीकी बदलावों को समझने में भी विफल रही है।
समय सीमा में विस्तार के बावजूद असंतोष की लहर
हालांकि आयोग ने सुझाव और आपत्तियां दर्ज कराने की अंतिम तिथि को 16 मार्च से बढ़ाकर 31 मार्च 2026 कर दिया है, लेकिन इससे कर्मचारियों का गुस्सा शांत नहीं हुआ है। IRTSA ने आयोग की चेयरपर्सन रंजना प्रकाश देसाई को पत्र लिखकर अपनी चिंताओं से अवगत कराया है। संगठन का स्पष्ट कहना है कि मात्र 18 सवालों के आधार पर इतने बड़े कर्मचारी वर्ग का भविष्य तय करना न्यायसंगत नहीं है, क्योंकि इसमें कई अहम पहलुओं को सिरे से गायब कर दिया गया है।
पुराने ग्रुप सिस्टम को खत्म करने की पुरजोर मांग
संगठन की सबसे प्रमुख मांग कर्मचारियों के वर्गीकरण यानी 'क्लासिफिकेशन' को आधुनिक बनाने की है। IRTSA का तर्क है कि ग्रुप A, B और C का वर्तमान ढांचा दशकों पुराना हो चुका है, जबकि आज के दौर में कार्यक्षेत्र की जिम्मेदारियां और टेक्नोलॉजी पूरी तरह बदल चुकी हैं। संगठन चाहता है कि इस पुराने ढर्रे को खत्म कर एक पारदर्शी ढांचा बनाया जाए, जिससे पदोन्नति और वेतन विसंगतियों को जड़ से खत्म किया जा सके। विशेष रूप से रेलवे के जूनियर इंजीनियरों और आईटी स्टाफ के लिए 'फंक्शनल प्रमोशन' की मांग की गई है, ताकि वे केवल MACP स्कीम के भरोसे न रहें।
भत्तों में कटौती और पेंशनर्स की अनदेखी पर तीखा विरोध
एक तरफ जहां 7वें वेतन आयोग के दौरान लगभग 196 प्रकार के भत्तों पर विस्तृत चर्चा हुई थी, वहीं 8वें वेतन आयोग ने अपनी प्रश्नावली में इन्हें समेटकर केवल 12 श्रेणियों में रख दिया है। रेल कर्मियों का कहना है कि हर भत्ता एक विशेष परिस्थिति और जरूरत के लिए होता है, इसे सीमित करना कर्मचारियों के आर्थिक अधिकारों पर कैंची चलाने जैसा है। इसके अलावा, प्रश्नावली में पेंशन और फैमिली पेंशन जैसे संवेदनशील मुद्दों का जिक्र न होना लाखों रिटायर्ड बुजुर्गों के लिए चिंता का सबब बन गया है। संगठन ने मांग की है कि पेंशनभोगियों के हितों को प्राथमिकता सूची में सबसे ऊपर रखा जाए।
सुझाव प्रक्रिया में भी बदलाव की जरूरत
तकनीकी और व्यावहारिक स्तर पर भी कर्मचारियों ने कई बदलावों की वकालत की है। उनकी मांग है कि ऑनलाइन सुझाव फॉर्म में शब्दों की सीमा (Character Limit) को बढ़ाया जाए ताकि वे अपनी बात विस्तार से रख सकें। साथ ही, केवल डिजिटल माध्यम के बजाय हार्ड कॉपी में भी सुझाव स्वीकार करने और पुराने अदालती फैसलों को साक्ष्य के रूप में पेश करने की अनुमति मांगी गई है। अब देखना यह होगा कि 31 मार्च की समय सीमा से पहले आयोग कर्मचारियों की इन मांगों पर क्या रुख अपनाता है।