Edited By Rohini Oberoi,Updated: 13 Jan, 2026 12:58 PM

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने वैवाहिक विवादों और गुजारा भत्ता (Maintenance) को लेकर एक बेहद महत्वपूर्ण और नजीर पेश करने वाला फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट कर दिया है कि यदि पत्नी उच्च शिक्षित (Well-Educated) है या उसके पास कोई प्रोफेशनल डिग्री है तो मात्र...
Educated Wife Maintenance : इलाहाबाद हाईकोर्ट ने वैवाहिक विवादों और गुजारा भत्ता (Maintenance) को लेकर एक बेहद महत्वपूर्ण और नजीर पेश करने वाला फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट कर दिया है कि यदि पत्नी उच्च शिक्षित (Well-Educated) है या उसके पास कोई प्रोफेशनल डिग्री है तो मात्र इस आधार पर पति उसे गुजारा भत्ता देने से इनकार नहीं कर सकता। जस्टिस गरिमा प्रसाद की एकल पीठ ने बुलंदशहर फैमिली कोर्ट के पुराने आदेश को पलटते हुए कहा कि कमाने की काबिलियत होना और वास्तव में नौकरी करना दो बिल्कुल अलग बातें हैं।
योग्यता नहीं हो सकती जिम्मेदारी से बचने का बहाना
अक्सर कोर्ट में पति यह दलील देते हैं कि उनकी पत्नी पढ़ी-लिखी है और वह खुद कमा सकती है इसलिए उसे मेंटेनेंस नहीं मिलना चाहिए। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इस रूढ़िवादी सोच पर करारी चोट की है। कोर्ट ने 8 जनवरी के अपने आदेश में साफ कहा कि कोई महिला कितनी भी शिक्षित क्यों न हो, जब तक वह वास्तव में कहीं कार्यरत (Employed) नहीं है और उसके पास आय का कोई ठोस जरिया नहीं है तब तक उसे आर्थिक रूप से स्वतंत्र नहीं माना जा सकता। अदालत ने रेखांकित किया कि शादी के बाद भारतीय समाज में महिलाएं अक्सर बच्चों और परिवार की परवरिश के लिए अपनी नौकरी और करियर को पीछे छोड़ देती हैं। वर्षों तक काम से दूर रहने के बाद उनके लिए दोबारा रोजगार पाना उतना आसान नहीं होता।
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बुलंदशहर फैमिली कोर्ट को फटकार
यह मामला बुलंदशहर की एक महिला से जुड़ा है। वहां की फैमिली कोर्ट ने महिला की गुजारा भत्ता की अर्जी यह कहते हुए खारिज कर दी थी कि महिला के पास प्रोफेशनल डिग्री है और उसने यह बात छिपाई थी।
हाईकोर्ट ने इस आदेश को रद्द करते हुए निम्नलिखित बातें कहीं:
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दुर्व्यवहार का आधार: महिला ने ससुराल में प्रताड़ना के कारण घर छोड़ा था जो अलग रहने का एक वैध कारण है।
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बच्चे का हक: फैमिली कोर्ट ने बच्चे के लिए मात्र 3,000 रुपये तय किए थे जिसे हाईकोर्ट ने आज के महंगाई के दौर में अपर्याप्त और मजाक बताया।
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पति की जिम्मेदारी: पति यह साबित करने में नाकाम रहा कि उसकी पत्नी कहीं नौकरी कर रही है। सिर्फ डिग्री होना गुजारा भत्ता न देने का आधार नहीं हो सकता।
एक महीने के भीतर नया आदेश जारी करने का निर्देश
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अब इस मामले को वापस फैमिली कोर्ट भेज दिया है और एक महीने का कड़ा अल्टीमेटम दिया है। कोर्ट ने कहा है कि पति की कुल आय, उसकी सामाजिक स्थिति और सोशल जस्टिस के सिद्धांतों को ध्यान में रखा जाए। पत्नी और बच्चे के लिए एक सम्मानजनक राशि तय की जाए ताकि वे अपना जीवन गरिमा के साथ जी सकें।
फैसले की मुख्य बातें (Quick Summary)
| मुख्य बिंदु |
हाईकोर्ट की टिप्पणी |
| शिक्षित पत्नी |
डिग्री होने का मतलब यह नहीं कि वह मेंटेनेंस की हकदार नहीं। |
| करियर ब्रेक |
पारिवारिक जिम्मेदारियों के लिए छोड़े गए करियर का सम्मान होना चाहिए। |
| पति की दलील |
"पत्नी कमा सकती है" - यह दलील कानूनी जिम्मेदारी से भागने जैसी है। |
| कोर्ट का आदेश |
एक महीने के अंदर सम्मानजनक गुजारा भत्ता तय करें। |