Edited By Sahil Kumar,Updated: 30 Oct, 2025 09:02 PM

हेल्थ इंश्योरेंस लेने वाले अधिकांश पॉलिसी होल्डर्स की यह उम्मीद होती है कि बीमार पड़ने पर इलाज जल्दी मिलेगा और अस्पताल से छुट्टी भी समय पर हो जाएगी। लेकिन हकीकत यह है कि इलाज तो जल्दी मिल जाता है, पर डिस्चार्ज की प्रक्रिया में घंटों की देरी मरीजों...
नेशनल डेस्कः हेल्थ इंश्योरेंस लेने वाले अधिकांश पॉलिसी होल्डर्स की यह उम्मीद होती है कि बीमार पड़ने पर इलाज जल्दी मिलेगा और अस्पताल से छुट्टी भी समय पर हो जाएगी। लेकिन हकीकत यह है कि इलाज तो जल्दी मिल जाता है, पर डिस्चार्ज की प्रक्रिया में घंटों की देरी मरीजों के लिए नई समस्या बन चुकी है। कई बार बीमा कंपनियां क्लेम को मंजूर करने में देर करती हैं, जिससे मरीज को 6 से 48 घंटे तक अस्पताल में अतिरिक्त रुकना पड़ता है। इसका असर इलाज के खर्च और मानसिक तनाव पर भी पड़ता है।
पेमेंट प्रोसेस में देरी
अक्सर बीमा कंपनियां इलाज की अनुमति जल्दी दे देती हैं, लेकिन पेमेंट प्रोसेस में देरी होती है। कुछ कंपनियां क्लेम रिजेक्शन का हवाला देकर बीमारियों को पहले से मौजूद बताकर विलंब करती हैं। ऐसे मामलों में मरीज को डॉक्टरी रिपोर्ट और अन्य दस्तावेज जमा करने पड़ते हैं, तभी क्लेम स्वीकृत होता है। लेकिन इसके बावजूद मरीज को कमरा किराया और अन्य खर्चों के लिए अतिरिक्त भुगतान करना पड़ता है।
डिस्चार्ज समरी और बिल में देरी क्यों?
अस्पतालों का कहना है कि डिस्चार्ज समरी बनाने में समय लगता है, लेकिन एक्सपर्ट्स का सवाल है कि जब सारी रिपोर्टें पहले से सिस्टम में मौजूद हैं तो प्रक्रिया सरल क्यों नहीं हो सकती। देरी का मुख्य कारण प्रशासनिक कामकाज और अस्पताल-बैंकिंग-बीमा कंपनियों के बीच समन्वय की कमी है। अक्सर फाइनल बिल और बीमा की शुरुआती मंजूरी में अंतर होने के कारण क्लेम अप्रूवल में समय लगता है।
बीमा कंपनियों की धीमी डिजिटल प्रक्रिया
अध्ययनों के अनुसार, बिना बीमा वाले मरीजों को औसतन 3.5 घंटे में डिस्चार्ज मिलता है, जबकि बीमा वाले मरीजों को 5 घंटे या उससे अधिक समय लग जाता है। इसके पीछे अस्पतालों की पुरानी आईटी व्यवस्था, बीमा कंपनियों की धीमी डिजिटल प्रक्रिया और आपसी समन्वय की कमी मुख्य कारण हैं।
तीन घंटे के भीतर क्लेम अप्रूव
भारतीय बीमा नियामक और विकास प्राधिकरण (IRDAI) के नियमों के अनुसार, अस्पताल को फाइनल बिल और डिस्चार्ज समरी मिलते ही तीन घंटे के भीतर क्लेम अप्रूव करना चाहिए। अगर देरी होती है तो अतिरिक्त रूम रेंट का खर्च बीमा कंपनियों को अपने शेयरहोल्डर फंड से चुकाना पड़ता है, ताकि पॉलिसी होल्डर्स पर आर्थिक बोझ न पड़े।
33 से अधिक इंश्योरेंस कंपनियां अब सरकार के NHCX प्लेटफॉर्म से जुड़ गई हैं, जिससे क्लेम प्रक्रिया तेज और पारदर्शी होने लगी है। इस नई व्यवस्था से मरीजों को जल्द ही राहत मिलने की उम्मीद है और हेल्थ इंश्योरेंस क्लेम का तनाव काफी हद तक कम हो सकता है।