हाई कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला- ‘महिला की ना का मतलब ना और…’

Edited By Updated: 09 May, 2025 11:54 AM

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बॉम्बे हाई कोर्ट की नागपुर बेंच ने एक महत्वपूर्ण फैसले में बॉलीवुड फिल्म 'पिंक' के मशहूर डायलॉग को सार्थक करते हुए स्पष्ट किया है। उन्होंने कहा कि किसी महिला द्वारा 'न' कहने का अर्थ स्पष्ट रूप से 'न' ही होता है।

नेशनल डेस्क : बॉम्बे हाई कोर्ट की नागपुर बेंच ने एक महत्वपूर्ण फैसले में बॉलीवुड फिल्म 'पिंक' के मशहूर डायलॉग को सार्थक करते हुए स्पष्ट किया है। उन्होंने कहा कि किसी महिला द्वारा 'न' कहने का अर्थ स्पष्ट रूप से 'न' ही होता है। न्यायमूर्ति नितिन सूर्यवंशी और न्यायमूर्ति एम डब्ल्यू चांदवानी की पीठ ने सामूहिक दुष्कर्म के एक मामले में तीन दोषियों की सजा को बरकरार रखते हुए यह टिप्पणी की। अदालत ने जोर देकर कहा कि सहमति के बिना किया गया कोई भी यौन कृत्य अपराध है और इसमें किसी भी प्रकार की अस्पष्टता की कोई गुंजाइश नहीं है। इसके अतिरिक्त, अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि किसी महिला की पिछली यौन गतिविधियों को उसकी वर्तमान असहमति को नकारने का आधार नहीं बनाया जा सकता।

दोषियों की अपील खारिज-

अदालत ने अपने फैसले में कहा कि जबरन यौन संबंध स्थापित करना एक महिला की निजता, उसकी मानसिक स्थिति और शारीरिक स्वतंत्रता पर सीधा हमला है। यह केवल एक यौन अपराध ही नहीं है, बल्कि यह आक्रामकता और उत्पीड़न का एक गंभीर कृत्य है। तीनों दोषियों ने निचली अदालत द्वारा दी गई सजा को चुनौती देते हुए हाई कोर्ट में अपील दायर की थी। अपनी याचिका में, उन्होंने पीड़िता के चरित्र और उसके पूर्व संबंधों पर सवाल उठाए थे। उन्होंने यह भी दावा किया कि महिला पहले उनमें से एक के साथ रिश्ते में थी और बाद में किसी अन्य पुरुष के साथ लिव-इन में रहने लगी थी। हालांकि, उच्च न्यायालय ने इस दलील को सिरे से खारिज कर दिया। अदालत ने स्पष्ट रूप से कहा कि किसी भी महिला के अतीत को उसकी वर्तमान असहमति के स्थान पर नहीं रखा जा सकता है। वर्तमान मामले में उसकी 'न' का मतलब 'न' ही है।

घर में घुसकर सामूहिक दुष्कर्म

यह मामला नवंबर 2014 का है, जब इन दोषियों ने पीड़िता के घर में जबरन प्रवेश किया और उसके साथी पर हमला किया। इसके बाद, वे महिला को एक सुनसान जगह पर ले गए और वहां उसके साथ सामूहिक बलात्कार किया। अदालत ने इस कृत्य को न केवल कानून का उल्लंघन माना, बल्कि इसे मानवीय गरिमा और एक महिला की स्वतंत्रता का घोर अपमान भी बताया। पीठ ने यह भी साफ किया कि यदि कोई महिला अतीत में किसी पुरुष के साथ संबंध में रही भी हो, तो भी उसे किसी भी समय अपनी सहमति वापस लेने का पूरा अधिकार है, और यदि वह 'न' कहती है, तो उसका 'न' ही अंतिम माना जाएगा।

सजा में आंशिक कमी-

 अदालत ने मानवीय आधार पर और मामले की परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए दोषियों की आजीवन कारावास की सजा को घटाकर 20 साल कर दिया। लेकिन अपने फैसले में, उन्होंने बलात्कार की गंभीरता को स्पष्ट रूप से रेखांकित किया और कहा कि यह अपराध समाज में नैतिक रूप से सबसे निंदनीय कृत्यों में से एक माना जाना चाहिए। न्यायालय का स्पष्ट और tegas संदेश यह है कि एक महिला की सहमति का निर्धारण केवल वही कर सकती है, न कि उसका अतीत और न ही किसी और की व्याख्या। 'न' का अर्थ हमेशा 'न' होता है, और सभी लोगों को महिलाओं और लड़कियों की गरिमा का सम्मान करना चाहिए।

 

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