Why Share Market Crash: बजट के बाद क्यों हिल गया शेयर बाजार? निर्मला सीतारमण के इस खास टैक्स के बढ़ाते ताश के पत्तों की तरह ढह गया सेंसेक्स-निफ्टी

Edited By Updated: 01 Feb, 2026 03:08 PM

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दलाल स्ट्रीट पर आज मानों बजट का 'बम' फूट गया है। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने वायदा बाजार (F&O) के शौकीनों को एक ऐसा झटका दिया है जिसकी उम्मीद शायद ही किसी ने की होगी। सरकार ने सट्टेबाजी पर लगाम लगाने और अपनी कमाई बढ़ाने के लिए सिक्योरिटी...

 नेशनल डेस्क: दलाल स्ट्रीट पर आज मानों बजट का 'बम' फूट गया है। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने वायदा बाजार (F&O) के शौकीनों को एक ऐसा झटका दिया है जिसकी उम्मीद शायद ही किसी ने की होगी। सरकार ने सट्टेबाजी पर लगाम लगाने और अपनी कमाई बढ़ाने के लिए सिक्योरिटी ट्रांजैक्शन टैक्स (STT) में भारी इजाफा कर दिया है। इस खबर के आते ही शेयर बाजार के दोनों प्रमुख सूचकांक, सेंसेक्स और निफ्टी, ताश के पत्तों की तरह ढह गए।

क्या है नया गणित?

सरकार ने फ्यूचर्स पर लगने वाले टैक्स को 0.02% से बढ़ाकर सीधा 0.05% कर दिया है, जो कि करीब 150% की विशाल बढ़त है। वहीं, ऑप्शंस के सौदों पर अब 0.1% के बजाय 0.15% टैक्स चुकाना होगा।इसका सीधा मतलब यह है कि अब शेयर बाजार में दांव लगाना पहले के मुकाबले काफी महंगा सौदा हो गया है।

ट्रेडर्स की जेब पर सीधा वार

आम ट्रेडर्स, जो बहुत कम मुनाफे के लिए बड़े वॉल्यूम में काम करते हैं, उनके लिए यह खबर किसी कड़वी दवा से कम नहीं है। अब हर एक करोड़ के टर्नओवर पर उन्हें करीब 10,000 रुपये अतिरिक्त टैक्स के रूप में देने होंगे। जानकारों का मानना है कि इससे बाजार में होने वाली अंधाधुंध ट्रेडिंग और सट्टेबाजी पर ब्रेक लगेगा, क्योंकि बढ़ी हुई लागत ट्रेडर्स के मुनाफे को निगल जाएगी।

विदेशी निवेशकों (FPIs) का रुख

भारत में पैसा लगाने वाले विदेशी निवेशक पहले से ही जनवरी के महीने में 41,000 करोड़ रुपये से ज्यादा की बिकवाली कर चुके हैं。 ऐसे में ट्रांजैक्शन टैक्स का बढ़ना उनके लिए 'करेला और नीम चढ़ा' जैसा साबित हो सकता है। विशेषज्ञों का कहना है कि लागत बढ़ने से विदेशी फंड अब भारत के बजाय ताइवान, कोरिया या अमेरिका जैसे अन्य उभरते बाजारों की ओर रुख कर सकते हैं, जहां टैक्स का बोझ कम हो।

बाजार में क्यों मची खलबली?

जैसे ही वित्त मंत्री ने इस बढ़त का ऐलान किया, सेंसेक्स पलक झपकते ही 2,000 अंक से ज्यादा नीचे गिर गया और निफ्टी ने भी 24,600 का स्तर तोड़ दिया। एंजेल वन और ग्रो जैसे ट्रेडिंग प्लेटफॉर्म्स के शेयरों में भी 17% तक की भारी गिरावट दर्ज की गई। सरकार का इरादा भले ही बाजार में बढ़ती अस्थिरता को रोकना और राजस्व बढ़ाना हो, लेकिन फिलहाल निवेशकों के लिए यह बजट काफी भारी पड़ रहा है।

अब समझते हैं कि STT आखिर है क्या और इसका असर क्यों इतना बड़ा माना जा रहा है
Security Transaction Tax एक तरह का सीधा टैक्स है, जो शेयर बाजार में किसी भी सिक्योरिटी की खरीद-फरोख्त पर लगाया जाता है। इसमें इक्विटी शेयर, फ्यूचर्स और ऑप्शंस सभी शामिल हैं। यह टैक्स ट्रेड के समय ही काट लिया जाता है, चाहे ट्रेडर को मुनाफा हो या नुकसान। STT की शुरुआत 1 अक्टूबर 2004 में हुई थी, ताकि सट्टेबाजी पर कुछ हद तक लगाम लगे, सरकार को राजस्व मिले और कैपिटल गेन टैक्स को ट्रैक करना आसान हो।

हालांकि 2018 में लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन टैक्स (LTCG) दोबारा लागू कर दिया गया था, लेकिन इसके बावजूद STT पहले की तरह जारी रहा। अब बजट 2026 में इसे और महंगा बना दिया गया है, खासकर डेरिवेटिव ट्रेडिंग के लिए।

कितना देना पड़ेगा Extra Tax
इस बढ़ोतरी का सबसे ज्यादा असर F&O ट्रेडर्स पर पड़ेगा। डेरिवेटिव ट्रेडिंग में आमतौर पर वॉल्यूम बहुत ज्यादा और मार्जिन बेहद पतले होते हैं। ऐसे में STT बढ़ने से ट्रेडिंग कॉस्ट सीधे बढ़ जाती है। उदाहरण के तौर पर, अगर कोई ट्रेडर फ्यूचर्स में 1 करोड़ रुपये का टर्नओवर करता है, तो उसे अब पहले के मुकाबले करीब 10,000 रुपये अतिरिक्त STT देना पड़ सकता है। इससे मुनाफा घटेगा, हाई-फ्रीक्वेंसी ट्रेडिंग कम हो सकती है और कई ट्रेडर्स को या तो कम ट्रेड करने पड़ेंगे या लीवरेज घटानी पड़ेगी।

बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला डेरिवेटिव सेगमेंट में ट्रेडिंग वॉल्यूम को ठंडा कर सकता है। कुछ एक्सपर्ट्स का यह भी कहना है कि सरकार का मकसद केवल टैक्स कलेक्शन बढ़ाना नहीं, बल्कि जरूरत से ज्यादा बढ़ चुकी F&O गतिविधियों पर लगाम लगाना भी हो सकता है। हालांकि यह जोखिम भी है कि वॉल्यूम घटने से टैक्स से होने वाली अतिरिक्त कमाई उतनी न हो, जितनी उम्मीद की जा रही है।

STT बढ़ोतरी का असर
STT बढ़ोतरी का असर सिर्फ घरेलू ट्रेडर्स तक सीमित नहीं है। विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों यानी FPIs पर भी इसका दबाव पड़ सकता है। जनवरी 2026 में ही FPIs भारतीय शेयर बाजार से 41,000 करोड़ रुपये से ज्यादा निकाल चुके हैं। इसके पीछे ग्लोबल रिस्क-ऑफ माहौल, अमेरिका में ऊंची बॉन्ड यील्ड और रुपये पर दबाव जैसे कारण हैं। ऐसे समय में STT बढ़ने से भारत में शॉर्ट-टर्म और डेरिवेटिव आधारित निवेश और कम आकर्षक हो सकता है।

सट्टेबाजी को नियंत्रित करने की कोशिश
विश्लेषकों का कहना है कि ज्यादा STT से पोस्ट-टैक्स रिटर्न घट जाता है, जिससे कुछ विदेशी निवेशक दूसरे उभरते बाजारों की ओर रुख कर सकते हैं। खासकर वे निवेशक जो शॉर्ट-टर्म ट्रेडिंग या डेरिवेटिव्स पर फोकस करते हैं। हालांकि जो FPIs लंबे समय के लिए, मजबूत फंडामेंटल्स के आधार पर निवेश करते हैं, उनके लिए यह फैसला बहुत बड़ा ब्रेकर साबित नहीं होगा। उनके लिए कमाई की संभावनाएं, रुपये की स्थिरता और नीतियों में निरंतरता ज्यादा मायने रखती है।

कुल मिलाकर, बजट 2026 में STT बढ़ाने का फैसला सरकार के लिए राजस्व बढ़ाने और बाजार में जरूरत से ज्यादा सट्टेबाजी को नियंत्रित करने की कोशिश माना जा रहा है। लेकिन इसके साथ यह जोखिम भी जुड़ा है कि ट्रेडिंग वॉल्यूम घटे, बाजार की धारणा कमजोर पड़े और कुछ विदेशी पूंजी भारत से बाहर की ओर देखे। आने वाले महीनों में साफ होगा कि यह कदम बाजार को स्थिर करता है या डेरिवेटिव सेगमेंट की रफ्तार को धीमा कर देता है।

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