POCSO एक्ट मामले में टेनिस कोच बरी, कोर्ट ने कहा- घटना के बाद भी उसी से ट्रेनिंग लेती रही पीड़िता फिर ...

Edited By Updated: 12 Jul, 2026 06:50 PM

tennis coach acquitted in pocso act case court says victim continued to receive

एक स्थानीय अदालत ने एक टेनिस कोच को 14 साल की छात्रा से दुष्कर्म करने के आरोप से बरी कर दिया। अदालत ने कहा कि घटना के बाद लड़की का व्यवहार और बिना किसी शिकायत के प्रशिक्षण जारी रखना, आरोपी के खिलाफ अपराध की कानूनी धारणा को गलत साबित करता है।

नेशनल डेस्क:  एक स्थानीय अदालत ने एक टेनिस कोच को 14 साल की छात्रा से दुष्कर्म करने के आरोप से बरी कर दिया। अदालत ने कहा कि घटना के बाद लड़की का व्यवहार और बिना किसी शिकायत के प्रशिक्षण जारी रखना, आरोपी के खिलाफ अपराध की कानूनी धारणा को गलत साबित करता है।

पीड़िता की गवाही पर शक 
ऐसा आरोप था कि टेनिस कोच ने नाबालिग छात्रा से दुष्कर्म किया, जिससे वह गर्भवती हो गयी। विशेष न्यायाधीश (पॉक्सो मामले) प्रेमल एस विथलानी ने 10 जुलाई को दिए आदेश में कहा कि कथित घटना के बाद पीड़िता के व्यवहार से उसकी गवाही की विश्वसनीयता पर शक पैदा होता है। उन्होंने कहा कि बिना कोई शिकायत किए कोच के साथ प्रशिक्षण जारी रखने के उसके फैसले से उसकी गवाही की विश्वसनीयता कम हो गई, जिससे सिर्फ़ उसके बयान के आधार पर आरोपी को दोषी ठहराना सही नहीं है। 

जबरन यौन उत्पीड़न का आरोप 
अदालत ने नवी मुंबई के रहने वाले 40 वर्षीय आरोपी को भारतीय दंड संहिता और यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण अधिनियम (पॉक्सो) अधिनियम के तहत सभी आरोपों से बरी कर दिया। अदालत ने बयानों में बड़ी विसंगतियों और पुष्टि करने वाले सबूतों की कमी का हवाला देते हुए यह फैसला सुनाया। अभियोजन पक्ष के अनुसार, नौवीं कक्षा की छात्रा ने आरोप लगाया कि आरोपी ने अगस्त और सितंबर 2023 में ठाणे की एक रिहायशी सोसाइटी में टेनिस कोर्ट के पास उसका दो बार जबरन यौन उत्पीड़न किया।

पेट दर्द की की शिकात पर सात हफ़्ते की गर्भवती निककली छात्रा
दरअसल यह मामला अक्टूबर 2023 में तब सामने आया जब उसने पेट दर्द की शिकायत की और चिकित्सा जांच से पता चला कि वह सात हफ़्ते की गर्भवती थीं, जिसके बाद चिकित्सीय तरीके से गर्भावस्था को समाप्त कर दिया गया। पीड़िता ने इस दौरान प्रशिक्षण देने वाले पर ही दुष्कर्म का आरोप लगाया था। 

सीसीटीवी फ़ुटेज में नहीं मिले सबूत 
अदालत ने कहा कि अभियोजन पक्ष अपने मामले के लिए कोई ठोस आधार नहीं बना पाया। न्यायाधीश ने कहा, ''घटना के बाद पीड़िता के व्यवहार को देखते हुए, मुझे लगता है कि उसकी गवाही भरोसेमंद और विश्वसनीय नहीं है इसलिए सिर्फ़ उसकी गवाही के आधार पर आरोपी को दोषी ठहराना सही नहीं होगा।

फोरेंसिक जांच में नहीं मिला कोई ठोस सबूत
 अदालत ने कहा कि गर्भपात के बाद मिले भ्रूण की फोरेंसिक डीएनए प्रोफाइलिंग से कोई ठोस नतीजा नहीं निकला और आवासीय सोसाइटी के सीसीटीवी फ़ुटेज में कोच और छात्रा के सामान्य समय पर आने-जाने के अलावा कुछ भी आपत्तिजनक नहीं दिखा। 

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