दूषित जल और राजनीति के ‘घंटे’ से निपटने का वक्त

Edited By Updated: 05 Jan, 2026 04:26 AM

it s time to deal with contaminated water and the  politics  of the situation

मध्य प्रदेश के इंदौर में दूषित पेयजल से 19 लोगों की मौत हो चुकी है। 200 से ज्यादा लोग अस्पतालों में भर्ती हैं। इस घटना ने पूरे देश को हिला दिया है। हालांकि मध्य प्रदेश सरकार ने शुक्रवार को मध्य प्रदेश हाईकोर्ट में जो रिपोर्ट पेश की, उसमें सिर्फ 4...

मध्य प्रदेश के इंदौर में दूषित पेयजल से 19 लोगों की मौत हो चुकी है। 200 से ज्यादा लोग अस्पतालों में भर्ती हैं। इस घटना ने पूरे देश को हिला दिया है। हालांकि मध्य प्रदेश सरकार ने शुक्रवार को मध्य प्रदेश हाईकोर्ट में जो रिपोर्ट पेश की, उसमें सिर्फ 4 लोगों की मौत दूषित पानी से होने की बात कही गई। राजनीति के अपने पर्दे होते हैं। इस पर्दादारी में भ्रष्टाचार जैसे कई अपराध पूरे संरक्षण से पलते हैं और इन पर ध्यान तभी जाता है, जब लोगों की जान पर बन आती है। इंदौर केंद्र सरकार की स्मार्ट सिटी परियोजना के पहले चरण के 20 ‘लाइटहाऊस शहरों’ में से एक है। 28 फरवरी 2016 को इसे भारत का सबसे स्वच्छ और सर्वश्रेष्ठ स्मार्ट शहर चुना गया था। सितम्बर 2023 में सर्वश्रेष्ठ स्मार्ट सिटी का खिताब हासिल किया। केंद्र सरकार के हर साल कराए जाने वाले स्वच्छ सर्वेक्षण में लगातार 8 वर्ष से देश का सबसे स्वच्छ शहर के रूप में दर्ज किया जा रहा है।  

मौत की वजह कोई रातों-रात हुई घटना नहीं। दूषित पेयजल की शिकायतें लगातार भागीरथपुरा के इलाके के लोगों द्वारा की जा रही थीं। मगर सरकार एक के बाद एक कई मौतें होने के बाद ही जागी। गंदे पानी की शिकायतों को अनदेखा करने और पाइपलाइन की टैंडर प्रक्रिया पर नजर न रखने के लिए निगम आयुक्त दिलीप यादव को हटा दिया गया है। पाइप लाइन बदलने के लिए अगस्त में हुए टैंडर को दबा कर रखने के लिए अपर आयुक्त रोहित सिसोनिया को निलंबित कर दिया गया है। इतना ही नहीं, गंदे पानी की शिकायतों पर कार्रवाई न करने के लिए प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र के प्रभारी अधीक्षण यंत्री संजीव श्रीवास्तव सहित 5 अधिकारी निलंबित किए गए हैं। मगर 4 महीने तक क्षेत्र की जनता की शिकायतों पर ध्यान न देने वाले पार्षद कमल वाघेला, जनता की शिकायतों पर कोई कदम न उठाने वाले महापौर पुष्यमित्र भार्गव और जलकार्य प्रभारी बबलू शर्मा पर कोई कार्रवाई नहीं की गई।

इस तरह राजनीति की मोटी खाल कवच की तरह भी काम करती है। लेकिन मध्य प्रदेश के ताकतवर शहरी आवास विकास मंत्री कैलाश विजयवर्गीय ने इस घटना में एक पत्रकार से बातचीत करते हुए जैसे ‘घंटा’ शब्द का इस्तेमाल किया, वह न केवल शर्मनाक है, बल्कि शासक दल भाजपा के लिए भी चुनौती है कि वह ऐसे बदजुबानी मंत्री की बातों को झेलते रहेंगे और भाजपा पर दाग लगाते रहेंगे। अब आइए तथ्यों की बात कर लें। पीने के लिए सप्लाई किए गए पानी के सैंपलों की जांच रिपोर्ट में इंसानों और जानवरों के मल में पाए जाने वाले बैक्टीरिया समूह फीकल कॉलिफॉर्म, ई-कोलाई, विब्रियो और प्रोटोजोआ पाए गए हैं। विब्रियो केलोरी से हैजा फैलता है। किसी पानी में फीकल कोलीफॉर्म की उच्च मात्रा का मतलब है कि पानी पीने या नहाने अथवा किसी भी तरह के इस्तेमाल के लिए असुरक्षित है। 

सरकारी तंत्र इस पर भी पर्दा डालने में जुटा है। इतनी मौतों के बाद भी सच को नकारने के लिए इसे प्रारंभिक रिपोर्ट कहकर टालने की कोशिश की जा रही है। एक समय था, जब ऑडिट रिपोर्ट मीडिया में सुर्खियां बनती थी। उन पर कार्रवाई भी होती थी। शायद यह तत्परता बहुत से लोगों की जान बचाने में भी सहायक थी। मगर अब तो कैग रिपोर्ट कब आती है और कब जाती है, मीडिया में कहीं बहुत सुर्खियां नहीं दिखतीं। सूचना की ताकत को कम करना पूरे सिस्टम और देश को खतरे में डालने वाली खतरनाक प्रवृति है। शहरी जल आपूर्ति की गुणवत्ता सुधारने के लिए एशिया विकास बैंक ने वर्ष 2004 में मध्य प्रदेश के 4 शहरों भोपाल, इंदौर, जबलपुर और ग्वालियर के लिए 25 करोड़ डालर (लगभग 2400 करोड़ रुपए) की ऋण मदद दी थी। इसका उद्देश्य शहर के हर नागरिक तक पानी पहुंचाना था। वर्ष 2019 में भोपाल और इंदौर में जल प्रबंधन पर कैग की रिपोर्ट आई थी, जिसमें इन दोनों शहरों में जलापूर्ति में गंभीर खामियां इंगित की गई थीं। मगर इस रिपोर्ट के आने के बाद कोई कार्रवाई नहीं की गई। इस रिपोर्ट में कहा गया था कि नगर निगम लीकेज की किसी भी समस्या को दूर करने में 22 से 108 दिन लगाता है। वर्ष 2013 से 2018 के बीच 4481 पेयजल नमूने पीने योग्य नहीं पाए गए। इस अवधि में दोनों शहरों में 5.45 लाख मामले जलजनित बीमारियों के दर्ज किए गए। इनमें डायरिया सबसे आगे थी। दोनों शहरों में जलकर के रूप में 470 करोड़ रुपए जनता से लिए जाते हैं। जहां से पानी सप्लाई होता है, पानी की वे टंकियां नियमित रूप से साफ नहीं की जातीं। 

देश के ज्यादातर शहरों में यह समस्या है, यहां तक कि देश की राजधानी में भी। राजधानी दिल्ली के जनकपुरी के ए-1 ब्लॉक में गंदे पानी की आपूर्ति का मामला राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एन.जी.टी.) में विचाराधीन है। राजधानी के जिन इलाकों से दूषित पेयजल की शिकायतें लगातार सामने आ रही हैं, उनमें जनकपुरी, भलस्वा,नारंग कॉलोनी, अशोक नगर जैसे क्षेत्र शामिल हैं। इस बीच दिल्ली जल बोर्ड ने पिछले महीने 11 दिसम्बर से 18 दिसम्बर के बीच विभिन्न जल शोधन संयंत्रों के कमान क्षेत्र से कुल 3203 पानी के सैंपल जांच के लिए लिए थे। इनमें 33 असंतोषजनक पाए गए। एक और रिपोर्ट हमें परेशान करने के लिए पर्याप्त है। इसके मुताबिक देश में पानी की गुणवत्ता के मामले में हम बहुत पीछे हैं। 120वें नंबर पर। हम खुद स्वीकार चुके हैं कि देश में गंदा पानी पीने से हर साल लगभग 2 लाख लोग मर जाते हैं। इस तरह भले हम दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्था और विकास के लाख दावे करते रहें, मगर ये दावे कोई मायने नहीं रखते, अगर हम अपने नागरिकों को शुद्ध पेयजल की आपूर्ति करने में भी अक्षम हैं। चाहे हम जल जीवन से जुड़े जितने भी अभियान चला लें लेकिन अगर साफ पानी अपने नागरिकों को दे नहीं सके तो सवाल उठेंगे। मंत्रालय और राज्य सरकारें इस काम में जुटें और बिना भ्रष्टाचार के इस काम को अपने बेटे-मां का काम मानें तभी राहत होगी। मूल नागरिक सुविधाओं के अभाव में कोई भी राष्ट्र विकसित राष्ट्र नहीं बन सकता।-अकु श्रीवास्तव

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