Edited By ,Updated: 28 Jun, 2023 04:59 AM

एकता में बिखराव या बिखराव में एकता? क्या आप हैरान हैं? निश्चित रूप से, क्योंकि 2024 में भाजपा को सत्ता से बाहर करने के एकमात्र उद्देश्य से अलग-अलग विचारधारा वाले 15 विपक्षी दलों ने अपने वैचारिक मतभेदों को भुलाकर पटना में बैठक की और इस बैठक में सीटों...
एकता में बिखराव या बिखराव में एकता? क्या आप हैरान हैं? निश्चित रूप से, क्योंकि 2024 में भाजपा को सत्ता से बाहर करने के एकमात्र उद्देश्य से अलग-अलग विचारधारा वाले 15 विपक्षी दलों ने अपने वैचारिक मतभेदों को भुलाकर पटना में बैठक की और इस बैठक में सीटों के बंटवारे और प्रतिस्पर्धी महत्वाकांक्षाओं से समझौता करने का प्रयास किया। हालांकि इन विपक्षी दलों ने भाईचारा और मैत्री दर्शाने का प्रयास किया, किंतु बिखरी हुई राजनीति में एकता बनाने की बातें करना आसान है, मगर वास्तव में एकता बनाना कठिन है।
क्या यह बैठक मतभेदों को भुलाने के लिए की गई थी? बिल्कुल नहीं। ‘आप’ प्रमुख अरविन्द केजरीवाल ने बैठक के अंत में फोटो खींचने के लिए उपस्थित होने से इंकार कर दिया क्योंकि कांग्रेस ने दिल्ली में नौकरशाही पर नियंत्रण के लिए दिल्ली सरकार के पर कतरने के लिए केन्द्र द्वारा लाए गए विवादास्पद अध्यादेश के मुद्दे पर राज्यसभा में ‘आप’ को समर्थन का भरोसा नहीं दिया। दोनों पार्टियों के बीच पंजाब और दिल्ली में खुली प्रतिस्पर्धा है और ‘आप’ कांग्रेस शासित राजस्थान में अपने पैर जमाने का प्रयास कर रही है, जहां इस वर्ष के अंत में चुनाव होने हैं। कांग्रेस कई वर्षों से पतन की ओर जा रही थी किंतु राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा और कर्नाटक तथा हिमाचल विधानसभा चुनावों में जीत से कांग्रेस अब राज्यों में भाजपा का मुकाबला करने का दावा कर रही है।
कांग्रेस एकमात्र ऐसी पार्टी है, जिसकी देश के लगभग सभी राज्यों में उपस्थिति है और उसे इस बारे में एक कठिन निर्णय लेना होगा कि वह विपक्षी एकता के लिए किन चीजों का त्याग करने के लिए तैयार है। राहुल गांधी ने पहले ही कह दिया है कि वह इस बारे में खुले मन से विचार करने और लचीला रुख अपनाने को तैयार हैं, किंतु उन्होंने ‘आप’ सरकार पर यह कहते हुए प्रश्न उठाया है कि भाजपा का मुकाबला करने के लिए गठबंधन के लिए यह अध्यादेश पूर्व शर्त नहीं हो सकता।
केवल ‘आप’ ही नहीं, अखिलेश यादव की समाजवादी पार्टी ने भी यह कहते हुए कांग्रेस को संदेश दिया कि हमें आशा है कि सभी दल, जो भाजपा को हराना चाहते हैं, सपा का खुले दिल से समर्थन करेंगे। यह अलग बात है कि उन्होंने अतीत में कांग्रेस और भाजपा दोनों से समान दूरी बनाए रखी क्योंकि वे उन दोनों को एक ही सिक्के दो पहलू दिखाई देते थे। देखना यह है कि ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस और चन्द्रशेखर राव की बी.आर.एस. किस तरह कांग्रेस के साथ मंच सांझा करती हैं क्योंकि राज्य स्तर पर दोनों ही कांग्रेस की प्रबल प्रतिद्वंद्वी हैं।
द्रमुक के स्टालिन ने सुझाव दिया कि अलग-अलग राज्यों के लिए अलग-अलग फार्मूला होना चाहिए और जिन राज्यों में जो दल मजबूत स्थिति में है, वहां पर उसके नेतृृत्व में गठबंधन किया जाना चाहिए, जिसे लालू के राजद ने भी समर्थन दिया। इससे पूर्व 70 के दशक में विपक्षी दलों ने कांग्रेस का मुकाबला करने के लिए एकजुट होने का प्रयास किया था। अब स्थिति अलग है। आज कांग्रेस विपक्ष में है। किंतु यह कार्य इतना आसान नहीं। भाजपा ने न केवल दो बार केन्द्र में निर्णायक जीत हासिल की है, अपितु अनेक राज्यों में भी जीती है। साथ ही राजनीतिक रूप से मोदी की कद-काठी अन्य सभी नेताओं से काफी ऊंची है और उनकी सरकार की नीतियों और योजनाओं की आम जनता में अपील है, जो आम आदमी के जीवन में सुखद बदलाव ला रही है। इस बैठक में मायावती की बसपा, पटनायक की बीजद, जगन मोहन रेड्डी की वाई.एस.आर.-सी.पी. ने भाग नहीं लिया। उन्हें साथ लिए बिना विपक्ष की राह आसान नहीं।
एक ठोस वैकल्पिक योजना के बिना विभिन्न दलों के जमावड़े के इन चुनावों में आसार कम ही दिखाई देते हैं। विपक्षी दलों की एकता की सबसे बड़ी चुनौती सीटों का बंटवारा, एक सांझा नेता की पहचान तथा न्यूनतम सांझा कार्यक्रम है और इन मुद्दों को विपक्षी दलों की शिमला में होने वाली अगली बैठक के लिए छोड़ दिया गया है। हालंाकि इस बैठक में सभी नेता इस बात पर सहमत थे कि भाजपा के विरुद्ध संयुक्त उम्मीदवार उतारे जाएं। क्या ये विपक्षी दल केन्द्र द्वारा राजनीतिक विरोधियों के विरुद्ध सी.बी.आई.-ई.डी. के दुरुपयोग जैसे विषयों को मुख्य मुद्दा बनाएंगे या मणिपुर संकट जैसे राष्ट्रीय मुद्दों पर कुछ अलग कहेंगे? देखना यह है कि विपक्षी दल वैचारिक मतभेद को कैसे दूर करते हैं।
हिन्दुत्व का विरोध करने या नरम हिन्दुत्व अपनाने को सांझा वैचारिक आधार मिलना कठिन है। इसका एक उदाहरण 2019 का उत्तर प्रदेश विधानसभा का चुनाव है, जहां पर सपा और बसपा ने गठबंधन किया था, किंतु जमीनी स्तर पर दोनों के जनाधार में विरोधाभास होने के कारण यह संभव नहीं हो पाया। अब तक राजनीतिक दलों ने विभिन्न कल्याण योजनाओं में फेरबदल किया। वे जातिगत जनगणना की मांग कर रहे हैं साथ ही हाशिए पर गए समुदायों के उत्थान, आर्थिक संकट आदि मुद्दे उठा रहे हैं, किंतु अभी उन्होंने कोई ऐसा मुद्दा नहीं चुना, जो इन चुनावों के लिए मुख्य मुद्दा बन सके।
इसके अलावा भाजपा की 303 सीटों में से 124 सीटें ऐसे राज्यों से हैं, जहां पर ये विपक्षी दल अक्सर एक दूसरे के विरुद्ध चुनाव लड़ते हैं। पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस का न केवल भाजपा अपितु कांग्रेस और वामपंथी दलों से भी मुकाबला है। उत्तर प्रदेश में भाजपा, कांग्रेस, सपा और बसपा चार दल मुकाबले में रहते हैं, इन क्षेत्रों में विपक्षी दलों के आंतरिक विरोधाभासों का प्रबंधन किया जाना आवश्यक है। पश्चिम बंगाल में वामपंथी दल और कांग्रेस राष्ट्रीय स्तर पर गठबंधन करते हैं और वे किस तरह पंजाब और केरल में सत्ता के दावेदार बनते हैं। एकजुट होकर चुनाव लडऩे की रूपरेखा इस बात का निर्धारण करेगी कि विपक्षी एकता का गुब्बारा हवा का दबाव सहेगा या फट जाएगा। चुनावी इतिहास बताता है कि वैचारिक एकजुटता और अन्य निष्ठाओं पर अक्सर व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाएं हावी होती हैं।
यह विपक्षी एकता निरर्थक साबित होगी, यदि उन 107 सीटों पर बदलाव नहीं होता, जहां भाजपा और कांग्रेस के बीच सीधा मुकाबला है और जहां पर भाजपा ने कांग्रेस को निर्णायक रूप से हराया है। जब तक कांग्रेस मध्य प्रदेश में सत्ता में नहीं आती और राजस्थान तथा छत्तीसगढ़ में अपनी सरकार नहीं बचा पाती, तब तक 2024 के चुनाव में भाजपा की स्थिति मजबूत रहेगी। वर्ष 2019 में भाजपा ने 224 सीटों पर 50 प्रतिशत से अधिक मतों से जीत दर्ज की। केवल 48 सीटों पर विपक्ष के उम्मीदवारों को मिले कुल मत भाजपा के उम्मीदवारों से अधिक थे। सरल शब्दों में कहें तो केवल गणित से काम नहीं चलेगा, इसलिए विपक्षी दलों को भाजपा के वोट बैंक में सेंध लगाने का प्रयास भी करना पड़ेगा, जैसा कि कांग्रेस ने कर्नाटक में किया।
विपक्षी दलों को ऐसी भाषा और शब्दों का चयन करना होगा, जो भाजपा का मुकाबला कर सके। चुनावी मशीन को चुस्त-दुरूस्त करना होगा और उसके लिए संसाधन जुटाने होंगे। मोदी ने पहले ही हिन्दुत्व के मुद्दे को पुन: उभार कर शुरुआत कर दी है। उन्होंने राष्ट्रवाद को पुन: परिभाषित करने तथा देश के सम्मान को मुख्य मुद्दा बनाने का प्रयास किया है। बड़ा प्रश्न उठता है कि रैलियों में नारों से परे भाजपा के विरुद्ध बिगुल कौन बजाएगा? विरोधाभासों की इस खान में, जहां पर रणनीतियां चुनावी लाभ को ध्यान में रखकर बनाई जाती हैं, वहां पर विपक्ष के लिए आगे की राह बनाने हेतु दूरदॢशता और लचीलेपन की आवश्यकता है। अब तक विपक्ष ने इस दिशा में एक छोटा सा कदम उठाया है। एकता और भाईचारे के बीच बिखराव का मोर्चा नहीं बनना चाहिए।-पूनम आई. कौशिश