पद्म पुरस्कारों की राजनीति : विवाद और संकेत

Edited By Updated: 30 Jan, 2026 03:58 AM

the politics of the padma awards controversies and implications

प्रतिष्ठा और सम्मान बनाम दरबारी राजनीति? 26 जनवरी गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर उत्कृष्टता को सम्मानित करने के लिए भव्य रूप से पद्म पुरस्कार प्रदान किए जाते हैं। पद्म पुरस्कार प्रदान करने पर कुछ लोग उसकी प्रशंसा करते हैं, कुछ उदासीनता दिखाते हैं...

प्रतिष्ठा और सम्मान बनाम दरबारी राजनीति? 26 जनवरी गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर उत्कृष्टता को सम्मानित करने के लिए भव्य रूप से पद्म पुरस्कार प्रदान किए जाते हैं। पद्म पुरस्कार प्रदान करने पर कुछ लोग उसकी प्रशंसा करते हैं, कुछ उदासीनता दिखाते हैं और विपक्ष आलोचना करता है, जिससे एक राजनीतिक विवाद पैदा होता है और विपक्षी दल मोदी सरकार पर आरोप लगाते हैं कि उसने राष्ट्रीय सम्मानों को राजनीतिक संदेश और संकेत देने का हथियार बना दिया है।  

सरसरी तौर पर देखने से लगता है कि सरकार ने पद्म पुरस्कारों को वैचारिक रूप से समावेशी बनाने के लिए वास्तविक प्रयास किए हैं। इनकी सूची में प्रतिद्वंद्वी राजनीतिक दलों और सोच के लोगों तथा सरकार के कटु आलोचकों के नाम भी शामिल हैं। विभिन्न राजनीतिक दलों के नेताओं को पद्म विभूषण देने से विपक्ष की राजनीति में एक रोचक मोड़ आया है। पद्म विभूषण प्राप्त करने वाले नेताओं में माकपा के संस्थापक नेता और केरल के पूर्व मुख्यमंत्री अच्युतानंद तथा झारखंड मुक्ति मोर्चा के संस्थापक शिबू सोरेन भी हैं। इसके माध्यम से दशकों में पहली बार एक वरिष्ठ कम्युनिस्ट नेता को सम्मानित किया गया है।  पद्म विभूषण प्राप्त करने वाले 5 लोगों में से 3 केरल से हैं, जहां पर इस वर्ष चुनाव होने वाले हैं और जहां भाजपा कभी भी अपने पांव नहीं जमा पाई। इसी  तरह तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल में भी इस वर्ष चुनाव हैं और इन राज्यों के लोगों को क्रमश: 13 और 11 पद्म पुरस्कार दिए गए हैं। 

चुनावी इंजीनियरिंग के विरुद्ध विपक्ष के आक्रोश को समझा जा सकता है क्योंकि पुरस्कार प्राप्त करने वाले लोगों की सूची में अनेक लोग उन समुदायों और क्षेत्रों से आते हैं, जो आगामी चुनावों में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। इन 3 राज्यों को देखिए, जिनकी जनसंख्या भारत की कुल जनसंख्या का 18 प्रतिशत है और इन्हें 37 प्रतिशत पद्म पुरस्कार मिले हैं। तथापि इस संबंध में सबसे तीखी प्रतिक्रिया महाराष्ट्र से आई है, जहां पर हाल के चुनावों में राजग की भारी जीत हुई है और महाराष्ट्र के लोगों को 15 पद्म पुरस्कार दिए गए हैं। पूर्व राज्यपाल कोश्यारी को पद्म पुरस्कार दिए जाने से एक पुराना राजनीतिक घाव हरा हो गया है। राज्यपाल के रूप में 2019 से 2023 का उनका कार्यकाल 2019 में फडऩवीस सरकार के गठन के समारोह को लेकर तथा छत्रपति शिवाजी महाराज तथा समाज सुधारक ज्योतिबा फुले पर टिप्पणियों को लेकर विवादों में रहा है।  

पद्म पुरस्कारों की सूची में ऐसे अनेक लोगों के नाम शामिल हैं जो सत्तारूढ़ वर्ग से जुड़े हैं, जिनमें राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के नारायणन, जो केरल में स्वदेशी जागरण मंच और नातेशन के संयोजक हैं। पद्म पुरस्कार उन अनजान और आम भारतीय नेताओं के लिए भी महत्वपूर्ण हैं, जिन्होंने सार्वजनिक जीवन में असाधारण योगदान दिया है किंतु उनको कोई पहचान नहीं मिली।  इसी तरह नवजात शिशु विशेषज्ञ, जिन्होंने भारत का पहला मानव मिल्क बैंक बनाया है, एक पूर्व बस कंडक्टर, जिन्होंने भारत की सबसे बड़ी पुस्तक और पत्रिका लाइब्रेरी बनाई है, एक भूतपूर्व रेलवे गार्ड, जो प्रतिष्ठित दलित लेखक और बुंदेलखंड के वीर लोक परंपरा के संरक्षक बने हैं, एक कारबी लोक गायक और एक चित्रकार, जिन्होंने 3000 वर्ष पुरानी कला को पुनर्जीवित किया है, इन सब लोगों को पद्म पुरस्कार से सम्मानित किया गया है। निश्चित रूप से आम भारतीय की मेहनत को पुरस्कृत करने से इन पुरस्कारों का सम्मान बढ़ा है।  

किंतु इन पुरस्कारों की सूची में उन लोगों की उपेक्षा की गई जो बेबाक बुद्धिजीवी और कार्यकत्र्ता रहे हैं, जो परंपरागत रूप से राज्य से प्रश्न पूछते रहे हैं। इस बार के पद्म पुरस्कार प्राप्त करने वाले लोगों की सूची में राजनीतिक और सामाजिक आलोचकों के नाम शामिल नहीं हैं। वे आवाजें, जो सार्वजनिक बहस और चर्चा को निर्धारित करती हैं। पद्म पुरस्कार देते समय विवेक का भी ध्यान रखा गया और यह सूची आज के राजनीतिक वातावरण में ऐसे किसी वर्ग या लोगों को नाराज नहीं करती, जो वास्तव में महत्वपूर्ण है। प्रश्न उठता है क्या मरणोपरान्त इस तरह पुरस्कार देने और पद्म पुरस्कारों में चयनात्मक समावेश लाने से क्या वास्तव में पद्म पुरस्कारों की विश्वसनीयता बढ़ती है या उन्हें खोखला बनाती है? 

आलोचक इसे युक्तिपूर्ण ढंग से दिया गया सम्मान बताते हैं जिन्हें विशेष समुदाय और क्षेत्रों के लोगों को आकॢषत करने के लिए प्रदान किया गया, जबकि वास्तविक विरोधियों को इस सूची से बाहर रखा गया। एक दृष्टिकोण यह है कि पुरस्कार उन लोगों को दिए जाते हैं, जो मौन रहते हैं, संकेतात्मक हैं और संस्थागत रूप से जुड़े हुए हैं। उत्तरोतर सरकारों ने इनका उपयोग व्यक्तिगत निष्ठा के लिए पुरस्कृत करने के लिए किया, जबकि नागरिक समाज में योग्य लोगों को नजरंदाज किया गया, जिससे पद्म पुरस्कारों का महत्व, प्रतिष्ठा और गरिमा कम हुई। समय आ गया है कि प्रतिस्पर्धी रूप से पुरस्कार देने की प्रक्रिया पर अंकुश लगे, विशेषकर तब, जब हमारा राष्ट्रीय गौरव, सम्मान और स्वाभिमान दाव पर हो। पुरस्कार आबंटन करते समय राष्ट्र के प्रति सच्चे रूप से विशिष्ट सेवा स्वीकार करने के उत्कृष्ट उद्देश्य को ध्यान में रखा जाना चाहिए, न कि इन्हें राजनीतिक राजदरबारियों को दिया जाना चाहिए।-पूनम आई. कौशिश
 

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