Edited By jyoti choudhary,Updated: 21 Mar, 2026 12:21 PM

एक चौंकाने वाले मामले में क्रेडिट कार्ड का पूरा बकाया चुकाकर उसे बंद कराने के करीब 10 साल बाद एक ग्राहक को बैंक की ओर से ₹33.83 लाख का डिमांड नोटिस भेज दिया गया। इस नोटिस से परेशान ग्राहक ने आखिरकार उपभोक्ता अदालत का रुख किया, जहां उसे न्याय के साथ...
बिजनेस डेस्कः एक चौंकाने वाले मामले में क्रेडिट कार्ड का पूरा बकाया चुकाकर उसे बंद कराने के करीब 10 साल बाद एक ग्राहक को बैंक की ओर से ₹33.83 लाख का डिमांड नोटिस भेज दिया गया। इस नोटिस से परेशान ग्राहक ने आखिरकार उपभोक्ता अदालत का रुख किया, जहां उसे न्याय के साथ मुआवजा भी मिला।
मामला कर्नाटक के मैसूर का है, जहां रहने वाले वेंकटेश ने 27 अगस्त 2010 को अपना क्रेडिट कार्ड बंद कराने के लिए आवेदन किया था। उस समय उनके कार्ड पर ₹15,500 का बकाया था, जिसे उन्होंने चुका दिया। बैंक ने भी पुष्टि कर दी थी कि उनका अकाउंट पूरी तरह बंद हो चुका है।
10 साल बाद मिला नोटिस
हालांकि, करीब एक दशक बाद 25 दिसंबर 2020 को उन्हें बैंक की ओर से एक लीगल नोटिस मिला, जिसमें ₹33.83 लाख का बकाया बताया गया। इसके बाद उन्हें लगातार कॉल, मैसेज और अन्य माध्यमों से भुगतान के लिए दबाव बनाया जाने लगा। 15 जून 2022 को बैंक ने दोबारा लीगल नोटिस भेजकर यही रकम जमा करने को कहा।
उपभोक्ता फोरम में शिकायत दर्ज कराई
लगातार मिल रहे नोटिस और कॉल्स से परेशान होकर वेंकटेश ने 18 जून 2022 को बैंक को लिखित जवाब दिया और स्पष्ट किया कि उन्होंने 10 साल पहले ही अपना कार्ड बंद कर दिया था और उसके बाद कोई लेन-देन नहीं किया। इसके बावजूद बैंक ने अपनी मांग वापस नहीं ली, जिसके बाद उन्होंने जिला उपभोक्ता फोरम में शिकायत दर्ज कराई।
कोर्ट ने क्या कहा
साल 2024 में जिला उपभोक्ता फोरम ने वेंकटेश के पक्ष में फैसला सुनाया और बैंक को ₹1 लाख मुआवजा देने का आदेश दिया, साथ ही 10% ब्याज और ₹3,000 मुकदमे का खर्च देने को कहा।
हालांकि, वेंकटेश इस फैसले से संतुष्ट नहीं थे और उन्होंने कर्नाटक राज्य उपभोक्ता आयोग में अपील की। 12 फरवरी 2026 को राज्य आयोग ने उनके पक्ष में बड़ा फैसला सुनाते हुए बैंक को ₹5 लाख मुआवजा, ₹1 लाख वकील की फीस और ₹50,000 मुकदमे का खर्च देने का आदेश दिया। साथ ही निर्देश दिया कि यदि 30 दिनों के भीतर भुगतान नहीं किया गया तो 9% वार्षिक ब्याज भी देना होगा।
अनफेयर ट्रेड प्रैक्टिस
राज्य आयोग ने इसे “अनफेयर ट्रेड प्रैक्टिस” करार देते हुए कहा कि जब ग्राहक पूरा बकाया चुका कर अपना क्रेडिट कार्ड बंद कर चुका था, तब उससे बार-बार बड़ी रकम की मांग करना गलत है। आयोग ने यह भी माना कि इस पूरे मामले से ग्राहक को मानसिक तनाव हुआ और उसकी क्रेडिट प्रोफाइल (सिबिल स्कोर) पर भी नकारात्मक असर पड़ा।