Edited By Niyati Bhandari,Updated: 28 Oct, 2019 09:50 AM

हमारे देश की विरासत में ऐसी कई चीजें हमें मिली हैं जिनकी बुनियाद पर कहा जा सकता है कि ‘सारे जहां से अच्छा, हिंदोस्तां हमारा।’ कुछ दिनों पहले हमने नवरात्रि और विजयादशमी का पर्व पूरे हर्षोल्लास से मनाया।
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हमारे देश की विरासत में ऐसी कई चीजें हमें मिली हैं जिनकी बुनियाद पर कहा जा सकता है कि ‘सारे जहां से अच्छा, हिंदोस्तां हमारा।’ कुछ दिनों पहले हमने नवरात्रि और विजयादशमी का पर्व पूरे हर्षोल्लास से मनाया। उससे पहले ईद भी मनाई, गणेश-चतुर्थी भी मनाई है। अब दीपावली का पर्व भी मनाया जा रहा है। दरअसल भारत विविधताओं से भरा देश है और यह हमारा गौरव है। सांप्रदायिक सद्भाव और राष्ट्रीय एकता का माहौल कायम रखने में और ‘मिल-जुलकर रहने की तहजीब’ को बढ़ावा देने में अनेक पर्वों का भी समावेश है। दशहरा, दीवाली, होली, ईद, क्रिसमस, गुरुपर्व, नवरोज जैसे विविध पर्व न केवल एक-दूसरे से जोड़ते हैं, बल्कि देश की शान विश्वपटल पर बढ़ाते भी हैं।
दीपावली हिंदू भाइयों का सबसे बड़ा त्यौहार है। क्या आपको यकीन होगा कि दीवाली के पर्व में कुछ जगह तो मुसलमानों के बिना दीपावली की कल्पना भी नहीं की जा सकती। उत्तर भारत के बिहार प्रांत के सीतामढ़ी में मुस्लिम समुदाय के हाथों बनाए गए दीपों से ही दीपावली का जश्न मनाया जाता है। यह परम्परा वर्षों से चली आ रही है।

सीतामढ़ी जिला धार्मिक रूप से संवेदनशील है। इस गांव में बड़ी आबादी मुसलमानों की है। यहां हजारों परिवार ऐसे हैं जिनके घर में दीपावली का पूजा-पाठ मुसलमानों के हाथों बनाए गए मिट्टी की पूजन सामग्री से ही संपन्न होता है। सीतामढ़ी के एक छोटे से गांव सिमरा के मुसलमान चाक पर अपना हुनर दिखाते हैं और आकर्षक दीप बनाते हैं। इन गांव वालों को न तो किसी धर्म से मतलब है और न ही किसी मजहब से। यहां से मिट्टी के दीये सीतामढ़ी और आस-पास के जिलों में भेजे जाते हैं। दीपावली का त्यौहार इनके द्वारा बनाए गए दीपों के बिना अधूरा है। यह परम्परा पिछले कितने वर्षों से चली आ रही है, यह कोई नहीं जानता।

मुंबई शहर के बाजारों में भी आपको हजारों ऐसी दुकानें मिल जाएंगी, जहां से दीपावली की खरीदारी होती है और वे दुकानें मुस्लिम समाज की होती हैं। हिंदू भाइयों की दुकानों के बिना ईद जैसे बड़े त्यौहारों की कल्पना भी नहीं की जा सकती। हमें धर्म और मजहब की दकियानूसी सोच को एक तरफ कर यह संदेश देना होगा कि इस मुल्क की संस्कृति, रीति-रिवाज, मान्यताएं अलग-अलग हो सकती हैं लेकिन ईश्वर के अस्तित्व की समझ सभी की एक है।