Dharmik Shastra Gyan- ‘दान दिए धन न घटे...’

Edited By Updated: 17 Nov, 2021 05:36 PM

dharmik shastra gyan in hindi

जब भगवान ने आपको दिया है तो आप भी दान करें। दानी कभी घाटे में नहीं रहता। दान तो कई गुणा बढ़ता है। रविंद्रनाथ टैगोर ने स्वरचित पुस्तक पुष्पांजलि में एक सत्य कथा का बड़ा सुंदर वर्णन किया है

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सद्गुरु कबीर जी ने बड़े ही सरल व स्पष्ट शब्दों में कहा है:

चिड़ी चोंच भर ले गई, नदी न घटियो नीर।
दान दिए धन न घटे, कह गए दास कबीर।

अभिप्राय: यह है कि जब भगवान ने आपको दिया है तो आप भी दान करें। दानी कभी घाटे में नहीं रहता। दान तो कई गुणा बढ़ता है। रविंद्रनाथ टैगोर ने स्वरचित पुस्तक पुष्पांजलि में एक सत्य कथा का बड़ा सुंदर वर्णन किया है कि एक बार एक सज्जन नगर के बाजार से ज्वार खरीद कर ला रहे थे। मार्ग के मध्य में उनकी भेंट एक भिखारी से हुई। भिखारी ने हाथ फैला कर कहा, ‘‘बाबू जी! कुछ देते जाओ।’’ उस भद्र पुरुष ने उस ज्वार में से एक दाना उठाया और भिखारी के हाथ पर रख दिया।

भिखारी ने शुभकामना व्यक्त करते हुए कहा, ‘‘अच्छा बाबू जी, भगवान आपको खूब दें। अनगिनत होकर मिले।’’

घर पहुंचते ही उन सज्जन ने ज्वार धर्मपत्नी के हाथों सौंप दी। जब वह उसे पकाने के लिए साफ करने लगी तो ज्वार के दानों में एक सोने का दाना देखकर आश्चर्यचकित रह गई। पत्नी ने तुरंत अपने पति से कहा, ‘‘आप जिस दुकानदार से ज्वार खरीद कर लाए हैं वह तो घाटे में रहा। उसके साथ धोखा हुआ है। उसका एक सोने का दाना गलती से इस ज्वार में आ गया है। कृपया उसे लौटा आइए।’’

पति को मध्य मार्ग में मिले भिखारी की तुरंत याद आ गई। पति ने माथे पर हाथ मार कर कहा, ‘‘धोखा एवं घाटा उस दुकानदार को नहीं हुआ, धोखा तो मेरे साथ हुआ है।’’
पत्नी ने पूछा, ‘‘वह कैसे?’’

पति ने गंभीर स्वर में कहा, ‘‘मैंने आते समय एक भिखारी के मांगने पर एक ज्वार का दाना दान में दिया था। उसे ही भगवान ने सोने में परिवर्तित कर दिया है। यदि मुठ्ठी भर दे देता तो आज हमारी दरिद्रता दूर हो जाती।’’

अत: जब दान देने का सुअवसर मिले तो दिल खोलकर उदारतापूर्वक दें। दान देकर सुख की जो अनुभूति होती है उसका वर्णन शब्दों द्वारा नहीं किया जा सकता। उस दिव्य आनंद की अनुभूति उसे ही होती है जो प्रेम एवं उदारतापूर्वक दान करता है।

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