Edited By Niyati Bhandari,Updated: 30 Jun, 2026 10:08 AM

ओडिशा के पुरी में 12वीं सदी के मंदिर में, सोमवार को भीषण गर्मी और उमस के बावजूद लाखों श्रद्धालु भगवान जगन्नाथ एवं उनके भाई-बहनों के पारंपरिक स्नान और उसके बाद उनके अनोखे ‘गज वेश’ (हाथी के रूप में सजावट) को देखने पहुंचे।
पुरी (एजैंसी): ओडिशा के पुरी में 12वीं सदी के मंदिर में, सोमवार को भीषण गर्मी और उमस के बावजूद लाखों श्रद्धालु भगवान जगन्नाथ एवं उनके भाई-बहनों के पारंपरिक स्नान और उसके बाद उनके अनोखे ‘गज वेश’ (हाथी के रूप में सजावट) को देखने पहुंचे।
‘स्नान यात्रा’, जगन्नाथ मंदिर के कैलेंडर के सबसे महत्वपूर्ण अनुष्ठानों में से एक है और यह वार्षिक रथ यात्रा उत्सवों की शुरूआत का प्रतीक है।
परंपरा के मुताबिक, ‘ज्येष्ठ पूर्णिमा’ (जिसे ‘देव स्नान पूर्णिमा’ भी कहा जाता है) के अवसर पर, शंखनाद और ‘हरि बोल’ के जयघोष के बीच, एक औपचारिक ‘पहांडी’ जुलूस के जरिए भगवान जगन्नाथ, भगवान बलभद्र, देवी सुभद्रा और चक्रराज सुदर्शन की ‘मूल विग्रह’ (काष्ठ की मूल मूर्तियों) को गर्भगृह से बाहर लाया गया।
देवी-देवताओं को ऊंचे ‘स्नान मंडप’ पर विराजमान किया गया, ताकि ‘ग्रैंड रोड’ पर एकत्रित श्रद्धालु पवित्र स्नान समारोह को देख सकें।
‘स्कंद पुराण’ के अनुसार, राजा इंद्रद्युम्न ने मंदिर में लकड़ी की मूर्तियों की स्थापना की थी। उन्होंने ही स्नान की इस रस्म की शुरूआत की थी। माना जाता है कि यह दिन इन दिव्य भाई-बहनों के जन्मदिन का भी प्रतीक है।
देवी-देवताओं को स्नान-वेदी पर विराजमान करने के बाद, सेवायतों ने ‘मंगल आरती’ की, जो मंदिर खुलने के बाद की पहली रस्म या पूजा होती है। ‘स्नान पूर्णिमा’ के दिन, भक्तों को एक खुले मंडप से ‘मंगल आरती’ देखने की अनुमति होती है।