Edited By Niyati Bhandari,Updated: 20 Jan, 2026 12:42 PM

Lord Shiva Katha: भगवान शिव को हिंदू धर्म में सबसे रहस्यमयी और दिव्य देवताओं में गिना जाता है। वे महादेव, शंकर और भोलेनाथ जैसे अनेक नामों से पूजे जाते हैं। उनके प्रत्येक स्वरूप, आभूषण और प्रतीक के पीछे एक गहन आध्यात्मिक और पौराणिक अर्थ छिपा हुआ है।...
Lord Shiva Katha: भगवान शिव को हिंदू धर्म में सबसे रहस्यमयी और दिव्य देवताओं में गिना जाता है। वे महादेव, शंकर और भोलेनाथ जैसे अनेक नामों से पूजे जाते हैं। उनके प्रत्येक स्वरूप, आभूषण और प्रतीक के पीछे एक गहन आध्यात्मिक और पौराणिक अर्थ छिपा हुआ है। चाहे उनके गले में लिपटा नाग हो, शरीर पर लगी भस्म हो या फिर उनके मस्तक पर विराजमान चमकता हुआ चंद्रमा हर चिन्ह अपनी एक अलग कथा कहता है।
ऐसे में भक्तों के मन में यह प्रश्न अक्सर उठता है कि भगवान शिव ने चंद्रमा को अपने मस्तक पर क्यों धारण किया? इसका उत्तर एक प्रसिद्ध पौराणिक कथा और गहरे प्रतीकात्मक अर्थ से जुड़ा हुआ है।
शिव का स्वरूप और चंद्रमा का प्रतीकात्मक महत्व
भगवान शिव को एक साथ उग्र और करुणामय दोनों रूपों में पूजा जाता है। उनका तांडव जहां प्रचंड ऊर्जा और संहार का प्रतीक है, वहीं चंद्रमा शांति, शीतलता और मन का प्रतीक माना जाता है। शिव के मस्तक पर स्थित चंद्रमा यह दर्शाता है कि वे उग्रता और शांति, दोनों के बीच पूर्ण संतुलन बनाए रखते हैं।
चंद्रमा का क्षय और वृद्धि भी समय के चक्र का प्रतीक है, जबकि शिव कालातीत हैं। यही कारण है कि उनके मस्तक पर चंद्रमा विराजमान होना उन्हें समय और मृत्यु से परे सिद्ध करता है।

पौराणिक कथा: समुद्र मंथन और कालकूट विष
पौराणिक ग्रंथों के अनुसार, एक समय देवताओं और असुरों ने समुद्र मंथन किया था। इस मंथन से 14 अमूल्य रत्न प्राप्त हुए, लेकिन सबसे पहले जो वस्तु निकली वह थी कालकूट विष। यह विष इतना प्रलयंकारी था कि उसकी गंध मात्र से ही सृष्टि में हाहाकार मच गया। देवता और असुर दोनों ही इसे देखकर भयभीत हो गए और कोई भी इसे ग्रहण करने का साहस नहीं कर सका।

भगवान शिव बने नीलकंठ
सृष्टि की रक्षा के लिए भगवान शिव आगे आए और उन्होंने उस कालकूट विष को अपने कंठ में धारण कर लिया। विष के प्रभाव से उनका कंठ नीला पड़ गया, जिसके बाद वे नीलकंठ कहलाए। हालांकि, विष धारण करने से उनके शरीर में अत्यधिक ताप उत्पन्न हो गया।
चंद्रमा ने दी शिव को शीतलता
भगवान शिव के शरीर में बढ़ती गर्मी को शांत करने के लिए चंद्रदेव उनकी सहायता के लिए आए। चंद्रमा की शीतल किरणों ने शिव जी को ठंडक प्रदान की और विष के प्रभाव को संतुलित किया। इसी कारण भगवान शिव ने चंद्रमा को अपने मस्तक पर स्थायी रूप से स्थान दिया।
क्या दर्शाता है शिव के मस्तक पर चंद्रमा?
भगवान शिव के मस्तक पर विराजमान चंद्रमा कई गहरे अर्थों को दर्शाता है शिव समय से परे और जन्म-मृत्यु के बंधन से मुक्त हैं। वे उग्र ऊर्जा और शीतल शांति का पूर्ण संतुलन हैं। चंद्रमा मन का प्रतीक है, जिस पर शिव का नियंत्रण दर्शाता है कि वे मन के भी स्वामी हैं।
