Magh Mela 2026 : 11 हजार रुद्राक्ष की माला, तन पर भस्म… कौन हैं दिगंबर नागा साधु अजय गिरि ?

Edited By Updated: 13 Jan, 2026 12:09 PM

magh mela 2026

Magh Mela 2026 : प्रयागराज की पावन धरा पर आयोजित होने वाला माघ मेला, महाकुंभ 2025 की भव्यता के बाद अब एक बार फिर अपनी आध्यात्मिक ऊर्जा से पूरी दुनिया को आकर्षित कर रहा है। त्रिवेणी संगम के तट पर उमड़ता आस्था का यह सैलाब केवल स्नान तक सीमित नहीं है,...

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Magh Mela 2026 : प्रयागराज की पावन धरा पर आयोजित होने वाला माघ मेला, महाकुंभ 2025 की भव्यता के बाद अब एक बार फिर अपनी आध्यात्मिक ऊर्जा से पूरी दुनिया को आकर्षित कर रहा है। त्रिवेणी संगम के तट पर उमड़ता आस्था का यह सैलाब केवल स्नान तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सनातन धर्म की जीवंत परंपराओं का एक अनूठा संगम बन गया है।

आस्था और साधना का संगम
माघ मेले में जहां एक ओर आम श्रद्धालु पुण्य की डुबकी लगा रहे हैं, वहीं दूसरी ओर संगम के रेतीले तटों पर साधु-संतों की कठोर तपस्या देखने को मिल रही है। मान्यताओं के अनुसार, यह समय केवल शरीर की शुद्धि का नहीं, बल्कि अहंकार के त्याग और आत्मिक जागरण का अवसर है।

11 हजार रुद्राक्षों वाले दिव्य साधु
इस वर्ष मेले में निरंजनी पंचायती अखाड़ा के दिगंबर नागा साधु, अजय गिरि जी विशेष चर्चा में हैं। उनका स्वरूप अत्यंत विहंगम है- उन्होंने सिर से लेकर गले तक लगभग 11,000 रुद्राक्षों की माला धारण की है। शिवपुराण के अनुसार, इतनी बड़ी संख्या में रुद्राक्ष धारण करने वाला साधक महादेव का अत्यंत प्रिय पात्र बन जाता है। लगभग 26 वर्ष पूर्व संन्यास लेने वाले अजय गिरि जी ने सांसारिक मोह त्याग कर स्वयं का पिंडदान किया और पूरी तरह शिव भक्ति में लीन हो गए। वे अपना अधिकांश समय केदारनाथ और मोक्षदायिनी काशी में व्यतीत करते हैं।

भस्म और वैराग्य का संदेश
मेले में नागा साधुओं के शरीर पर लिपटी भस्म श्रद्धालुओं को जीवन के सबसे बड़े सत्य से परिचित कराती है। साधु अजय गिरि बताते हैं कि भस्म जहाँ शिव को प्रिय है, वहीं यह हमें निरंतर याद दिलाती है कि जीवन क्षणभंगुर है और मृत्यु ही अंतिम सत्य है।

कल्पवास और पौराणिक महत्व
माघ मेले को कल्पवास का महापर्व भी कहा जाता है। यह आयोजन पौष पूर्णिमा से शुरू होकर माघ पूर्णिमा तक चलता है।  पद्मपुराण और मत्स्यपुराण में उल्लेख है कि माघ मास में संगम स्नान का फल हजारों अश्वमेध यज्ञों के समान होता है। भक्त यहां महीने भर रहकर सात्विक जीवन, भजन-कीर्तन और दान-पुण्य के माध्यम से अपनी जीवन की दिशा को आध्यात्म की ओर मोड़ते हैं।

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