Mohini Ekadashi: शास्त्रों के अनुसार ये है मोहिनी एकादशी व्रत की पूरी जानकारी

Edited By Niyati Bhandari, Updated: 11 May, 2022 08:12 AM

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वैशाख मास के शुक्ल पक्ष में मोहिनी एकादशी का व्रत करने से सभी कामनाएं जहां पूर्ण हो जाती हैं वहीं प्रभु कृपा प्राप्त होने से जीवन में किसी प्रकार का कोई अभाव नहींं

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Mohini Ekadashi 2022: वैशाख मास के शुक्ल पक्ष में मोहिनी एकादशी का व्रत करने से सभी कामनाएं जहां पूर्ण हो जाती हैं, वहीं प्रभु कृपा प्राप्त होने से जीवन में किसी प्रकार का कोई अभाव नहींं रहता। संसार के सभी सुखों को भोगता हुआ व्यक्ति अंत में प्रभु के धाम को प्राप्त होता है। शास्त्रों के अनुसार भगवान को एकादशी तिथि अति प्रिय है तथा नदियों में गंगा को जो स्थान प्राप्त है वही स्थान व्रतों में एकादशी को प्राप्त है। कहा जाता है कि जिसकी कोई कामना किसी भी कारण वश पूरी न हो रही हो वह एकादशी का व्रत सच्चे मन से करें तो उसकी कोई भी मनोकामना अधूरी नहीं रहती। इसके लिए दशमी को व्रत करने का संकल्प करना चाहिए। एकादशी में व्रत तथा द्वादशी को प्रात: उठकर मां लक्ष्मी जी का पूजन करने मात्र से ही मनुष्य सभी बंधनों से मुक्त एवं सभी सुखों से युक्त हो जाता है। इस बार मोहिनी एकादशी व्रत 12 मई को है तथा सभी मनुष्यों को इस व्रत का पालन जरुर करना चाहिए।

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Mohini Ekadashi puja vidhi कैसे करें पूजन
मोहिनी एकादशी को भगवान श्री कृष्ण के पूजन का विधान है। इस दिन सूर्य निकलने से पूर्व उठकर नित्य स्नानादि क्रियाओं से निवृत होकर भगवान की प्रतिमा को स्नान करवाकर उन्हें ऊंचे आसन पर विराजमान करें, धूप ,दीप ,नेवैद्य व पुष्प आदि से विधिवत सच्चे मन से उनका पूजन करें। मौसम के अनुसार आम तथा अन्य मीठे फलों का प्रभु को भोग लगाएं। ब्राह्मणों को यथासम्भव भोजन कराएं तथा उन्हें फल आदि के साथ दक्षिणा देकर उनका आशीर्वाद प्राप्त करें। स्वयं किसी प्रकार का अन्न ग्रहण न करें बल्कि फलाहार करें। रात को प्रभु नाम का संकीर्तन करते हुए धरती पर शयन करना चाहिए तथा अपना सारा दिन प्रभु नाम सिमरण में बिताना ही उत्तम कर्म है। अगले दिन यानि द्वादशी (13 मई) को स्नान आदि करके ब्राह्मणों को दक्षिणा सहित दान आदि देकर स्वयं भोजन करें तो प्रभु अति प्रसन्न होते हैं और जीव को सभी प्रकार की सुख-समृद्धि प्रदान करते हैं।

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Mohini Ekadashi significance क्या है पुण्य फल
वैसे तो इस नश्वर संसार में जो मनुष्य शास्त्रों के अनुसार जीवन में आचरण करते हुए सत्कर्म करते हैं और अपना अधिक से अधिक समय प्रभु नाम संकीर्तन में बिताते हुए किसी भी तरह का व्रत आदि के नियमों का पालन करते हैं उन पर प्रभु सदा प्रसन्न रहते हैं परंतु एकादशी तिथि प्रभु को अति प्रिय होने के कारण अति पुण्यफलदायिनी है। 

पुराणों के अनुसार इस व्रत से श्रेष्ठ कोई व्रत नहीं है। यह एकादशी व्रत जीव के सभी प्रकार के कष्टों,दुखों, संतापों का नाश करने वाला है। किसी प्रकार के मानसिक तनाव को दूर करके मन में सुख-शांति प्रदान करने के लिए यह एकादशी व्रत अमोध अस्त्र है। शास्त्रों के अनुसार इस व्रत की महिमा को पढ़ने तथा सुनने वाले को भी एक हजार गोदान करने के बराबर फल मिलता है। मोहजाल तथा सभी प्रकार के पापों एवं पातकों से छुटकारा पाने के लिए यह व्रत किसी अमृत से कम नहीं है। यह व्रत जीव को उसके निंदित कर्मों के पाप से भी मुक्ति प्रदान करता है तथा इसके प्रभाव से मेरु पर्वत के समान किए गए महापाप भी नष्ट हो जाते हैं। 

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Mohini Ekadashi vrat katha मोहिनी एकादशी व्रत की कथा
सरस्वती नदी के किनारे बसे भद्रावती नगर में द्युतिमान नामक चन्द्रवंशी राजा राज्य करता था तथा उसी नगर में एक धन-धान्य से परिपूर्ण एवं शांत स्वभाव वाला धन पाल नामक वैश्य भी रहता था, जो सदा किसी न किसी पुण्यकर्मों में लगा रहता था। उसने जनहित्त में अनेक कुंए, प्याऊ लगवाएं तथा धर्मशालाएं, मठ एवं बगीचे बनाकर लोगों की अत्याधिक सेवा की। उसने सड़कों के किनारे आम, नीम जामुन आदि के अनेक छायादार पेड़ लगवाएं। भगवान विष्णु जी की कृपा से उसके पांच पुत्र थे। 

जिनमें सुमना, सद्बुद्धि, मेधावी और सुकृति तो अपने पिता के समान बड़े धर्मात्मा थे परंतु धृष्ट बुद्धि अपने नाम के अनुकूल ही बड़ा दुष्ट था। उसका मन सदा ही पापों में लगा रहता था। वह अपने पिता के धन का दुरुपयोग करता रहता था तथा उसने न तो देवी-देवताओं का पूजन किया और न ब्राह्मणों एवं पितरों का कभी आदर-सत्कार किया। एक दिन उसके पिता ने तंग आकर दुखी ह्रदय से उसे उसके दुराचरण के लिए घर से निकाल दिया तब उसके सभी बंधु-बांधवों ने भी उसका परित्याग कर दिया। ऐसे में दुखी होकर वह भूख-प्यास से परेशान होकर इधर-उधर भटकने लगा। 

कहते हैं जब किसी के पुण्य कर्म उदय होते हैं तो उन्हें संतों के दर्शन करने तथा उनके उपदेश सुनने का मौका मिलता है। ऐसे ही किसी पिछले पुण्य कर्म के प्रभाव से धृष्ट बुद्धि घूमते हुए महर्षि कौण्डिल्य जी के आश्रम में जा पहुंचा। तब वैशाख का महीना चल रहा था तथा महर्षि गंगास्नान करके लौट रहे थे। धृष्ट बुद्धि महर्षि के सामने हाथ जोड़कर उनसे अपने दुखों को दूर करने के लिए प्रार्थना करने लगा तो उन्हें उस पर दया आ गई। महर्षि ने उसे मोहिनी एकादशी का व्रत करने को कहा। व्रत के प्रभाव से वह अपने सभी पाप बंधनों से छूट गया तथा अंत में उसे प्रभु का धाम प्राप्त हुआ।  

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क्या कहते हैं विद्वान
एकादशी व्रत में रात्रि जागरण की अत्याधिक महिमा है। इसलिए व्रती को चाहिए कि वह रात को धरती पर शयन करें तथा अपना अधिक से अधिक समय प्रभु नाम संकीर्तन में बिताए। यदि कोई यह व्रत नहीं भी कर सकता तो एकादशी के दिन चावल न खाएं तथा न किसी को खाने को दें। इस दिन तुलसी और सूर्यदेव को जल चढ़ाना और तुलसी मंदिर में दीप दान करना अति उत्तम फल दायक है।

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