Edited By Niyati Bhandari,Updated: 15 Jan, 2026 10:21 AM

Ramayan Katha on Ravan and Shani Dev: रामायण में लंकापति रावण को एक ओर महान शिव भक्त और अपार तपस्वी बताया गया है, तो दूसरी ओर उसे अहंकार, अत्याचार और असुरी प्रवृत्ति का प्रतीक भी माना गया है। अपनी असीम शक्तियों के बल पर रावण देवताओं, ऋषियों और...
Ramayan Katha on Ravan and Shani Dev: रामायण में लंकापति रावण को एक ओर महान शिव भक्त और अपार तपस्वी बताया गया है, तो दूसरी ओर उसे अहंकार, अत्याचार और असुरी प्रवृत्ति का प्रतीक भी माना गया है। अपनी असीम शक्तियों के बल पर रावण देवताओं, ऋषियों और मनुष्यों को भयभीत किया करता था। रामायण में वर्णित एक ऐसी ही कथा रावण और कर्मफल दाता शनि देव से जुड़ी है, जिसने तीनों लोकों को हिला कर रख दिया था।
त्रिलोक विजेता रावण और उसका अहंकार
रामायण के अनुसार, रावण ने भगवान शिव और ब्रह्मा जी की कठोर तपस्या कर अनेक वरदान प्राप्त किए थे। वह स्वयं को अजेय मानने लगा था। शिवभक्त होने के बावजूद उसमें अहंकार इतना बढ़ गया था कि उसने देवताओं को भी बंदी बना लिया था। रावण की यही अहंकारी प्रवृत्ति अंततः उसके विनाश का कारण बनी।

सभी ग्रहों को बना लिया था बंदी
रामायण की कथाओं के अनुसार, रावण ने केवल देवताओं को ही नहीं, बल्कि नवग्रहों को भी अपने वश में कर लिया था। उसने सभी ग्रहों को लंका में एक अंधेरी जगह पर कैद कर रखा था। विशेष रूप से शनि देव को उसने अपने सिंहासन के पास जंजीरों में जकड़कर अपने पैरों के नीचे रखा था।

मेघनाद (इंद्रजीत) की कुंडली और ग्रहों की चाल
रावण का पुत्र मेघनाद, जिसे इंद्रजीत कहा जाता था, अत्यंत पराक्रमी था। उसने देवताओं के राजा इंद्र को पराजित कर यह उपाधि प्राप्त की थी। मेघनाद के जन्म के समय ब्रह्मा जी ने भविष्यवाणी की थी कि वह महान योद्धा बनेगा, लेकिन उसके जीवन में उतार-चढ़ाव आते रहेंगे।
इस भविष्यवाणी से चिंतित होकर रावण ने मेघनाद की कुंडली में ग्रहों को अपने अनुकूल रखने का प्रयास किया। उसने सभी ग्रहों को स्थिर कर दिया, लेकिन शनि देव बार-बार अपनी स्थिति बदल रहे थे।

शनि देव को जंजीरों में क्यों जकड़ा?
रावण यह भली-भांति जानता था कि यदि शनि देव की वक्री दृष्टि एक बार उसके राज्य, परिवार या पुत्र मेघनाद पर पड़ गई, तो उसका पतन निश्चित है। इसी भय से रावण ने शनि देव को युद्ध में पराजित कर उन्हें बंदी बना लिया।
शनि देव को जंजीरों में बांधकर अपने पैरों के नीचे रखने का उद्देश्य यही था कि वे अपनी दृष्टि उठाकर लंका, रावण या उसके वंश की ओर न देख सकें।

हनुमान जी ने कराया शनि देव को मुक्त
रामायण के अनुसार, जब हनुमान जी माता सीता की खोज में लंका पहुंचे, तो उन्होंने शनि देव को कैद अवस्था में देखा। हनुमान जी ने शनि देव को मुक्त कराया। शनि देव ने प्रसन्न होकर हनुमान जी को वरदान दिया कि जो भी भक्त सच्चे मन से हनुमान जी की उपासना करेगा, उस पर शनि की पीड़ा कम होगी।
कथा से मिलने वाला संदेश
यह कथा स्पष्ट करती है कि कोई भी व्यक्ति, चाहे वह कितना ही शक्तिशाली क्यों न हो, कर्मफल और दैवी नियमों से ऊपर नहीं हो सकता। अहंकार और अधर्म अंततः विनाश का कारण बनते हैं।
