Sant Guru Kabir Das: कर्म को महत्व देते थे ‘कबीर जी’

Edited By Updated: 02 Feb, 2023 11:20 AM

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सन् 1518 में कबीर जी की आत्मा इस जगत को छोड़ कर परमात्मा में समा गई। कबीर जी का चेहरा हमेशा रूहानी ज्योति से चमकता रहता था। मरता-मरता जग मुवा औसर मुवा न कोई। कबीर ऐसे मरि मना ज्यूं बहुरि न मरना होई॥

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Sant Guru Kabir Das: सन् 1518 में कबीर जी की आत्मा इस जगत को छोड़ कर परमात्मा में समा गई। कबीर जी का चेहरा हमेशा रूहानी ज्योति से चमकता रहता था। 

मरता-मरता जग मुवा औसर मुवा न कोई। कबीर ऐसे मरि मना ज्यूं बहुरि न मरना होई॥

भावार्थ- वह कहते हैं कि सांसारिक विषयों में फंस कर मरते-मरते यह संसार नष्ट हो रहा है और उचित अवसर पर मरना न आया। उन्होंने कहा मन ऐसा मर जिससे फिर कभी मरना न पड़े, अर्थात तू जीवन-मृत्यु के चक्र से छूट जाए।

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मनहो कठोर मेरे बनारस नरक न बांचिया जाई। हर का संत मेरे हाड़ंवै त सगली सैन तराई॥

भावार्थ- कबीर साहिब ने कहा- कुछ लोग अपने अंतिम समय में दूर-दूर से चल कर बनारस आते हैं ताकि मुक्ति प्राप्त हो सकें। उन्होंने स्पष्ट कर दिया कि कठोर हृदय पापी यदि बनारस में मरेगा तो वह नरक से बच नहीं सकेगा। प्रभु के भक्त यदि मगहर में मरते हैं तो वे खुद ही मुक्त नहीं होते बल्कि अपने साथ सब शिष्यों को भी तार लेते हैं।

रात गंवाई सोय कर, दिवस गवायो खाय। हीरा जनम अमोल था, कौड़ी बदले जाय॥

भावार्थ- कबीर जी कहते हैं कि हीरे के समान अमूल्य जीवन प्रभु के नाम स्मरण में न लगा कर मनुष्य ने व्यर्थ ही गंवा दिया। रात सोने में और दिन खाने में गंवा दिया। कबीर जी ने हमेशा जात-पात को बढ़ावा देने वाले रीति-रिवाजों के विरुद्ध लड़ाई लड़ी। राजाओं-महाराजाओं के आगे भी नहीं झुके और सभी को एक संदेश से नवाजा कि ऐसी धारणाओं जो समाज में नफरत उत्पन्न करती हैैं, को त्यागना चाहिए। जिससे समाज में खुशी की लहर जाग उठे। कबीर जी ने कभी भी जात-पात के मतभेदों को स्वीकार नहीं किया।

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जात नहि जगदीश की, हरिजन की कहां होय। जात-पात के कीच में, डूब मरो मत कोय॥

कबीर जी ने कहा- जब प्रभु की कोई जाति नहीं है तो उसके भक्तों और प्रेमियों की क्या जाति हो सकती है। मनुष्यों को जात-पात के कीचड़ में नहीं डूबना चाहिए।

कबीर मेरी जात कउ, सभ को हसनेहार। बलिहारी इस जात कउ, जिह जपिओ सिरजनहार॥

भावार्थ- कबीर साहब कहते हैं कि मेरी जाति को लेकर लोग मेरा उपहास और तिरस्कार करते हैं पर मैं इस जाति को उत्तम मानता हूं क्योंकि इसमें जन्म लेकर मैंने प्रभु की भक्ति की है।

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हिंदू कहूं तो मैं नहीं, मुसलमान भी नहि। पांच तत्व का पुतला गैबी खेलै माहिं॥

कबीर जी ने कहा- मैं न हिंदू हूं न मुसलमान, वह सभी मनुष्यों के समान पांच तत्वों की देह धारण किए हुए हैं, जिसके अंदर अदृश्य आत्मा निवास करती है। 
             
उनके शिष्यों में उनके अंतिम संस्कार को लेकर मतभेद हो गया। राजा वीर सिंह बघेला की रहनुमाई में हिंदू कबीर जी के शव का अंतिम संस्कार करना चाहते थे और नवाब बिजलीखान तथा मुस्लिम अनुयायी दफनाना चाहते थे। दोनों में विवाद बढ़ा और आपस में झगड़े की नौबत आ गई। उस समय कुछ शिष्यों ने कबीर जी के शव की ओर ध्यान दिया तो कपड़ा हटाने पर शव की जगह फूलों का ढेर पाया। कबीर जी एक आम जुलाहा होते हुए प्रभु मिलाप की खास अवस्था प्राप्त कर चुके थे।

ज्यूं जल में जल पैसि न निकसै, यूं ढुरि मिले जुलाहा।

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