Edited By Sarita Thapa,Updated: 03 Jan, 2026 03:24 PM

हम सभी जानते हैं कि एक न एक दिन यह शरीर मिट्टी में मिल जाना है, फिर भी मौत का नाम सुनते ही मन में एक अनजाना डर और घबराहट पैदा हो जाती है।
Premanand Maharaj Teachings : हम सभी जानते हैं कि एक न एक दिन यह शरीर मिट्टी में मिल जाना है, फिर भी मौत का नाम सुनते ही मन में एक अनजाना डर और घबराहट पैदा हो जाती है। लोग मृत्यु से इसलिए डरते हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि सब कुछ छूट जाएगा या फिर वे अपने कर्मों के हिसाब से घबराते हैं। पूज्य प्रेमानंद महाराज कहते हैं कि मृत्यु डराने वाली नहीं, बल्कि एक विश्राम की तरह होनी चाहिए। तो आइए जानते हैं प्रेमानंद महाराज ने निर्भय होकर जीने का कौन सा मंत्र बताया है।
वर्तमान में जिएं, अंत की चिंता छोड़ें
महाराज जी के अनुसार, मौत का डर उन्हें सताता है जो केवल भविष्य की चिंता करते हैं या अतीत की गलतियों में उलझे रहते हैं। अगर आप आज के क्षण में भगवान के नाम का आश्रय लेकर सही कर्म कर रहे हैं, तो मृत्यु का समय आने पर आपको कोई मलाल नहीं होगा।
नाम जप ही है असली कवच
प्रेमानंद महाराज बार-बार एक ही बात पर जोर देते हैं- राधा नाम या अपने इष्ट का नाम जप। वे कहते हैं कि जिसके मुख पर और हृदय में निरंतर भगवान का नाम चलता है, काल भी उसके सामने नतमस्तक हो जाता है। जब अंत समय आता है, तो नाम जप करने वाले व्यक्ति को यमदूतों का भय नहीं सताता, बल्कि उसे परमात्मा की गोद का अहसास होता है।

पछतावे से बचने का तरीका: अभी से सुधारें कर्म
अंतिम समय में सबसे बड़ा दुख यह होता है कि मैंने अपना जीवन व्यर्थ गंवा दिया या मैंने किसी का दिल दुखाया। महाराज जी सलाह देते हैं।
किसी का हक न मारें।
दूसरों की बुराई से बचें।
जितना हो सके सेवा और दान करें। अगर आपका हृदय निर्मल है, तो मौत आपके लिए एक उत्सव बन जाएगी।
मोह का त्याग
मृत्यु कष्टदायक तब बनती है जब हम संसार की वस्तुओं और रिश्तों से बहुत अधिक चिपक जाते हैं। प्रेमानंद जी कहते हैं कि यह मानकर जिएं कि सब कुछ ठाकुर जी का है और मैं केवल एक सेवादार हूं। जब मोह कम होगा, तो शरीर छोड़ते वक्त कोई पीड़ा या पछतावा नहीं होगा।
मृत्यु को 'घर वापसी' समझें
महाराज जी बहुत ही सुंदर बात कहते हैं- जैसे एक बच्चा स्कूल की छुट्टी होने पर खुशी-खुशी घर भागता है, वैसे ही एक भक्त अपने शरीर का त्याग परमात्मा से मिलने के उल्लास में करता है। उनके लिए मौत अंत नहीं, बल्कि परमात्मा से मिलन की शुरुआत है।

शास्त्रों की बात, जानें धर्म के साथ