Saturday special: शनि स्वयं कष्ट भोगते हुए भी जातक को सुख देते हैं

Edited By Updated: 01 Apr, 2023 06:55 AM

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शनि नैसर्गिक अशुभ ग्रह है। यह दुख, रोग, शोक, पीड़ा एवं निर्धनता का कारक ग्रह माना गया है। जन्म पत्रिका में चंद्रमा जिस राशि में बैठा हो उससे द्वादश राशि में शनि का प्रवेश होने पर साढ़ेसाती का प्रारंभ माना जाता है। नवग्रह में शनि सबसे धीरे चलने वाला...

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Saturday special: शनि नैसर्गिक अशुभ ग्रह है। यह दुख, रोग, शोक, पीड़ा एवं निर्धनता का कारक ग्रह माना गया है। जन्म पत्रिका में चंद्रमा जिस राशि में बैठा हो उससे द्वादश राशि में शनि का प्रवेश होने पर साढ़ेसाती का प्रारंभ माना जाता है। नवग्रह में शनि सबसे धीरे चलने वाला ग्रह है। यह सभी राशियों का पूरा भ्रमण करने में 30 वर्ष का समय लेता है तथा राशि में लगभग अढ़ाई वर्ष गोचर करता है। जन्म राशि से द्वादश भाव, जन्म राशि तथा जन्म राशि से द्वितीय राशि में शनि का गोचर शनि की साढ़ेसाती कहलाता है। 

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चंद्र राशि से चतुर्थ राशि में तथा अष्टम राशि में शनि का गोचर शनि की चतुर्थस्थ एवं अष्टमस्थ ढैया कहलाती है।

सामान्यत: शनि की साढ़ेसाती एवं ढैया को कष्टों, विपत्तियों का समय माना जाता है जो भ्रामक तथ्य हैं। यह आवश्यक नहीं है कि साढ़ेसाती में कोई भी शुभ कार्य अथवा जीवन में प्रगति नहीं होती। यह अनुभव में आया है कि शनि की साढ़ेसाती में स्वयं के एवं संतानों के विवाह सम्पन्न हुए, संतान की प्राप्ति हुई, कार्य क्षेत्र में उन्नति हुई, नौकरी में पदोन्नति मिली और धन की वृद्धि भी होती है। समस्त अशुभता के बावजूद शनि स्वयं कष्ट भोगते हुए भी जातक को सुख प्रदान कर देते हैं।    

‘शनि देव’ पर तेल क्यों चढ़ता है इस संदर्भ में एक कथा है। एक बार सूर्य का तेज सहन न कर पाने के कारण उनकी पत्नी संज्ञा ने अपने ही जैसी एक आकृति तैयार की जिसका नाम स्वर्णा रखा। वह सूर्य की सेवा में संज्ञा के निर्देशानुसार रहने लगी। सूर्य देव भी इस रहस्य को जान नहीं पाए। इस मध्य सूर्यदेव से स्वर्णा को पांच पुत्र और दो पुत्रियां उत्पन्न हुईं। स्वर्णा संज्ञा की संतानों पर कम ध्यान देने लगीं। 

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एक दिन संज्ञा के पुत्र शनिदेव को भूख लगी। स्वर्णा ने भोजन के स्थान पर शाप दिया कि तेरा पांव अभी टूट जाए। शनि ने सारी बात सूर्यदेव को बताई। वह समझ गए कि कोई मां अपने पुत्र को इस प्रकार शाप नहीं दे सकती। उन्होंने स्वर्णा की सारी सच्चाई जान कर कहा, ‘‘स्वर्णा तुम्हारी मां नहीं है पर मां के समान तो है। उनका शाप फल देगा पर अधूरा। तुम्हारी टांग टूगेगी नहीं पर लंगड़े अवश्य हो जाओगे।’’ 

तब से शनि लंगड़े हो गए।

आनंद रामायण में उल्लेख है कि हनुमान जी और शनि देव का जब युद्ध हुआ और हनुमान जी ने शनि देव को बंदी बना लिया तब उन्होंने मुक्ति की प्रार्थना की। हनुमान जी ने इस शर्त पर कि वह राम भक्तों को कष्ट नहीं देंगे, उन्हें बंधन मुक्त कर दिया। शनि देव ने हनुमान जी से घावों पर लेपन के लिए तेल की प्रार्थना की। हनुमान जी ने शनि को तेल से स्नान करा दिया। तब से शनि देव को तेल चढ़ता है।

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