Shri krishna: माखनचोर से लेकर गीता उपदेशक बनने तक की कथा

Edited By Updated: 12 Oct, 2020 02:32 PM

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तू जिसे इतने उत्साह से पहुंचाने जा रहा है उसी का आठवां पुत्र तुझे मारेगा! इस आकाशवाणी से कंस चौंका। सचमुच वह अपने चाची की छोटी लड़की देवकी के विवाह होने पर कितने उत्साह से पहुंचाने जा रहा था

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Shri krishna: तू जिसे इतने उत्साह से पहुंचाने जा रहा है उसी का आठवां पुत्र तुझे मारेगा! इस आकाशवाणी से कंस चौंका। सचमुच वह अपने चाची की छोटी लड़की देवकी के विवाह होने पर कितने उत्साह से पहुंचाने जा रहा था, दिग्विजयी कंस-मृत्यु का भय शरीरासक्त को कायर बना देता है। वह अपनी बहन का वध करने को ही तैयार हो गया। वसुदेव जी ने सद्योजात शिशु उसे देने का वचन दिया। इतने पर भी कंस ने दम्पति को रखा कारागार में ही। विरोध करने पर अपने ही पिता उग्रसेन को भी उसने बंदी बनाया और वह स्वयं मथुरा का नरेश बन गया।

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बच्चे होते सत्यभीरू वसुदेव जी कंस के सम्मुख लाकर रख देते। वह उठकर शिला पर पटक देता। हत्या से शिलातल कलुषित होता गया। छ: शिशु मरे। सातवें गर्भ में भगवान शेष पधारे। योगमाया ने उन्हें आकर्षित करके गोकुल में रोहिणी जी के गर्भ में पहुंचा दिया। अष्टम गर्भ में वह अखिलेश आया । धरा असुर नरेशों के अशुभ कर्मों से आकुल है, उसके आराधक उसी की प्रतीक्षा में पीड़ित हो रहे हैं तो वह आएगा ही।

कंस का कारागार भाद्र मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी की मेघाच्छन्न अर्धनिशा। चंद्रोदय के साथ श्री कृष्ण चंद्र का प्राकट्य हुआ। बंदियों के नेत्र धन्य हो गए। वह चतुर्भुज देखते-देखते शिशु बना, शृंखलाएं स्वत: शिथिल हुईं द्वार उन्मुक्त हुआ, वसुदेव जी उस हृदय धन को गोकुल जाकर नंद भवन में रख आए।

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कंस को मिली यशोदा की योगमाया रूपी कन्या और जब कंस उन्हें शिलातल पर पटक रहा था तब वह योगमाया गगन में अष्टभुजा हो गई। गोकुल की गलियों में आनंद उमड़ा। आनंदघन नंदरानी की गोद में जो उतर आया था। कंस के क्रूर प्रयास उस प्रवाह में प्रवाहित हो गए। पूतना, शकटासुर, वात्याचक्र-सब विफल होकर भी कन्हैया के हाथों से सद्गति पा गए। मोहन चलने लगा, बड़ा हुआ और घर-घर धूम मच गई, वह हृदय चोर नवनीत चोर जो हो गया था। गोपियों के उल्लसित भाव सार्थक करने थे उसे। यह लीला समाप्त हुई अपने घर का ही नवनीत लुटाकर। मैया ने ऊखल में बांधकर दामोदर बना दिया। यमलार्जुन का उद्धार तो हुआ, लेकिन उन महावृक्षों के गिरने से गोप शंकित हो गए। वे गोकुल छोड़कर वृंदावन जा बसे।

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वृंदावन, गोवर्धन, यमुना-पुलिन ब्रज-युवराज की मधुरिम क्रीड़ा के चलने में सबने और सहायता दी। श्रीकृष्ण वत्सचारक बने। कंस का प्रयत्न भी चलता रहा। बकासुर, वत्सासुर, प्रलम्ब, धेनुक, अघासुर, मयपुत्र, व्योमासुर आदि आते रहे। श्याम सुंदर  तो सबके लिए मोक्ष का अनावृत द्वार हैं। कालिया के फनों पर उस ब्रज बिहारी ने रास का पूर्वाभ्यास कर लिया। ब्रह्मा जी भी बछड़े चुराकर अंत में उस नटखट की स्तुति ही कर गए। इंद्र के स्थान पर गोवर्धन-पूजन किया गोपों ने और गोपाल ने। देव कोप की महावर्षा से गिरिराज को सात दिन अंगुली पर उठाकर ब्रज को बचा लिया। देवेंद्र उस गिरिधारी को गोविंद स्वीकार कर गए। कंस के प्रेषित वृषासुर, केशी आदि जब गोपाल के हाथों से कर्मबंधन मुक्त हो गए तब उसने अक्रूर को भेजकर उन्हें मथुरा बुलवाया। नंद बाबा बलराम श्याम तथा गोपों के साथ मथुरापुरी पहुंचे।

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उस दिन मार्ग में ही कुब्जा का कूबड़ दूर कर दिया। कंस का आराधित धनुष उसके गर्व की भांति तोड़ डाला। दूसरे दिन महोत्सव था कंस की कूटनीति का। रंगमंडप के द्वार पर श्रीकृष्ण चंद्र ने महागज कुवलापीड को मार कर महोत्सव का श्रीगणेश किया। अखाड़े में उन सुकुमार-श्याम-गौर अंगों से चाणूर, मुष्टिक, शल, तोशल जैसे मल्ल चूर्ण हो गए। कंस के जीवन की पूर्णाहुति से उत्सव पूर्ण हुआ। महाराज उग्रसेन बदीगृह से पुन: राज सिंहासन पर शुभासीन हुए।

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श्री कृष्ण ब्रज में कुल ग्यारह वर्ष, तीन मास रहे थे। इस अवस्था में उन्होंने जो दिव्य लीलाएं कीं, वे जीवन पथ प्रशस्त करती हैं। उसके बाद तो श्याम ब्रज पधारे ही नहीं। उद्धव को भेज दिया एक बार आश्वासन देने। अवश्य ही बलराम जी द्वारका से आकर एक मास रह गए एक बार। अवंती जाकर श्याम सुंदर ने अग्रज के साथ शिक्षा प्राप्त की। गुरु दक्षिणा में गुरु का मृत पुत्र पुन: प्रदान कर आए। मथुरा लौटते ही कंस के श्वसुर जरासंध की चढ़ाइयों में उलझना पड़ा। वह सत्रह बार ससैन्य आया और पराजित होकर लौटा।

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पांडवों का परित्राण तो श्रीकृष्ण ही थे। राजसूज्ञ यज्ञ युधिष्ठिर का होता नहीं, यदि जरासंध मारा न जाता। राजसूय का वह सभास्थल उसे वनमाली के आदेश से मय ने बनाया। द्यूत में हारे पांडवों की पत्नी राजसय की साम्राज्ञी द्रौपदी जब भरी सभा में दुशासन द्वारा निर्वस्त्र की जाने लगी, वस्त्रावतार धारण किया प्रभु ने। दुर्योधन ने दुर्वासा जी को वन में भेजा ही था पांडवों के विनाश के लिए पर शाक का एक पत्र खाकर त्रिलोकी को तुष्ट करने वाला वह पार्थप्रिय उपस्थित जो हो गया।

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वह मयूर मुकुटी पांडवों के लिए संधिदूत बनकर आया। विदुर पत्नी के केले के छिलकों का रसास्वाद कर गया। सुदामा के तंदुलों ने प्रेम का स्वाद सिखा दिया था। युद्ध का आरंभ हुआ और वह राजसूय का अग्रपूज्य पार्थ सारथि बना। संग्राम भूमि में उस गीता गायक ने अर्जुन को अपनी दिव्य अमर वाणी से प्रबुद्ध किया। भीष्म, द्रोण, कर्ण, अश्वत्थामा के दिव्यास्त्रों से रक्षा की पांडवों की। युद्ध का अंत हुआ। युधिष्ठिर को सिंहासन प्राप्त हुआ। पांडवों का एकमात्र वंशधर उत्तरापुत्र परीक्षित मृत उत्पन्न हुआ। अश्वत्थामा के ब्रह्मास्त्र ने उसे प्राणहीन कर दिया था। श्री कृष्ण ने उसे पुनर्जीवन दिया।

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श्रीकृष्ण का चरित पूर्णता का ज्वलंत प्रतीक है। भगवत्ता के छ: गुण-ऐश्वर्य, धर्म, यश, शोभा, ज्ञान और वैराग्य सब उसमें पूर्ण हैं। त्याग, प्रेम, भोग और वैराग्य-सब उसमें पूर्ण हैं। त्याग, प्रेम, भोग और नीति सब उन पूर्ण पुरुष में पूर्ण ही हैं। हिन्दू संस्कृति निष्ठा की पूर्णता को आदर्श मानती है। श्री कृष्ण में समस्त निष्ठाओं की पूर्णता होती है।

 

 

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