तीर्थ के रूप में प्रसिद्ध है सिरपुर, यहां प्रकट हुए थे त्रिदेव

Edited By Updated: 26 May, 2017 01:07 PM

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पुरातात्विक धरोहर के रूप में प्रसिद्ध सिरपुर अनेक पौराणिक कहानियों को अपने में समेटे हुए अनुपम, मनोरम स्थली है, जहां प्रकृति के अनेक रहस्य छिपे हुए

पुरातात्विक धरोहर के रूप में प्रसिद्ध सिरपुर अनेक पौराणिक कहानियों को अपने में समेटे हुए अनुपम, मनोरम स्थली है, जहां प्रकृति के अनेक रहस्य छिपे हुए हैं। पौराणिक कथाओं के अनुसार उक्त स्थल कभी दानव राज बाणासुर की राजधानी हुआ करता था। यही वह जगह है जहां पर बाणासुर ने घोर तपस्या कर महादेव को प्रसन्न किया था। सिरपुर को प्राचीन काल में श्रीपुर के नाम से जाना जाता था। इस जगह पर ब्रह्मा, विष्णु और महेश संयुक्त रूप से त्रिनाथ के नाम से प्रकट हुए थे।
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सावन मास में अंचल के अनेक महिला, पुरुष व बच्चे श्रद्धावत देवपुर स्थित देवधारा से जल लेकर पैदल लगभग 60 किलोमीटर चलकर सिरपुर स्थित गंधेश्वर महादेव के शिवलिंग में जलाभिषेक करते हैं। उस महीने हजारों की तादाद में महिला पुरुष व श्रद्धालुओं की भीड़ और वह भी गेरुआ रंग के वस्त्र धारण किए हुए मंदिर परिसर में देखने को मिलती है।

प्रभु श्री राम की जननी कौशल्या का जन्म स्थान होने के कारण सिरपुर को ‘दक्षिण कोसल’ भी कहा जाता है। दीर्घ काल में पुत्र (राम लक्ष्मण) प्राप्त होने से ममतावश बनाया गया मंदिर जिसे आज हम लक्ष्मण मंदिर के नाम से जानते हैं अपनी विशिष्ट कलाकृति के कारण सम्पूर्ण भारत में अपनी एक अलग पहचान रखता है।कालांतर में इस स्थल पर बब्रूवाहन का साम्राज्य रहा। ज्ञात हो कि मध्यम पांडव (अर्जुन) को अकेले बारह वर्ष का वनवास भोगना पड़ा था जिसमें से कुछ दिन अर्जुन ने इसी स्थल पर बिताए थे। महानदी के मनोरम तट पर राजकुमारी उलुपी व सुलुपी स्नान कर रही थीं जिस पर मोहित होकर अर्जुन ने गंधर्व विवाह कर लिया था। उलुपी को बब्रूवाहन के रूप में एक संतान की प्राप्ति हुई थी जो पराक्रम में अर्जुन से बढ़कर था।

भोले नाथ महादेव की प्रकट स्थली होने के कारण सिरपुर छत्तीसगढ़ की काशी के नाम से जाना जाता है। काशी के संदर्भ में कहा जाता है कि काशी शिवलोक है। अत: काशी में प्राण छोड़ने पर शिवलोक की प्राप्ति होती है और जीव को बार-बार इस धरती पर जन्म लेना नहीं पड़ता उसे सीधे ही भगवान शंकर की अनन्य भक्ति प्राप्त होती है। महादेव की जटा से निकली गंगा की तर्ज पर सिहावा पर्वत से शृंगी ऋषि के वरदान से प्रकट हुई महानदी छत्तीसगढ़ की पावन धरा सिरपुर से होकर गुजरने के कारण इसकी धार्मिक महत्ता स्वत: बढ़ जाती है। चीनी यात्री ह्वेनसांग के अनुसार सिरपुर पूर्व काल में बौद्ध भिक्षुओं का गढ़ रहा है जहां भगवान गौतम बुद्ध अपने शिष्यों सहित पधारे थे। उनके अनुयायियों द्वारा बनाए गए बौद्ध स्तूप के भग्नावशेष आज भी मौजूद हैं।

छत्तीसगढ़ शासन द्वारा इस ऐतिहासिक स्थल के भग्नावशेषों को धरोहर के रूप में संजोकर रखा जा रहा है व खंडहरों को यथार्थ रूप में लाने का प्रयास किया जा रहा है। साथ ही सुरंग टिल्ला, बुद्ध विहार आदि स्थलों का संरक्षण भी किया गया है। प्रतिवर्ष माघी पूर्णिमा को यहां विशाल मेले का आयोजन किया जाता है। जहां हजारों के हुजूम में श्रद्धालु आते हैं तथा पुण्य सलिला महानदी में स्नान, ध्यान, तर्पण कर अपने अभीष्ट कार्य की सिद्धि हेतु पूजन-अर्चन करते हैं। साथ ही मन मोहक ऐतिहासिक धरा का दर्शन लाभ पाते हैं। आस्था का केंद्र सिरपुर छत्तीसगढ़ वासियों के लिए गौरव एवं सौभाग्य प्रदायक है। 

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