Edited By Niyati Bhandari,Updated: 30 Apr, 2023 08:55 AM

वीतरागभयक्रोधा मन्मया मामुपाश्रिता:। बहवो ज्ञानतपसा पूता मद्भावमागता:॥
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Srimad Bhagavad Gita: वीतरागभयक्रोधा मन्मया मामुपाश्रिता:। बहवो ज्ञानतपसा पूता मद्भावमागता:॥
अनुवाद एवं तात्पर्य : आसक्ति, भय तथा क्रोध से मुक्त होकर, मुझमें पूर्णतया लीन होकर और मेरी शरण में आकर बहुत से व्यक्ति भूतकाल में मेरे ज्ञान से पवित्र हो चुके हैं। इस प्रकार से उन सबों ने मेरे प्रति दिव्य प्रेम को प्राप्त किया है।

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जैसा कि पहले कहा जा चुका है, विषयों में आसक्त व्यक्ति के लिए परम सत्य के स्वरूप को समझ पाना अत्यंत कठिन है। सामान्यतया जो लोग देहात्मबुद्धि में आसक्त होते हैं, वे भौतिकतावाद में इतने लीन रहते हैं कि उनके लिए यह समझ पाना असंभव-सा है कि परमात्मा व्यक्ति भी हो सकता है।
ऐसे भौतिकतावादी व्यक्ति इसकी कल्पना तक नहीं कर पाते कि ऐसा दिव्य शरीर भी है जो नित्य तथा सच्चिदानंदमय है।

भौतिकतावादी कल्पना के अनुसार शरीर नाशवान, अज्ञानमय तथा अत्यंत दुखमय होता है। अत: जब लोगों को भगवान के साकार रूप के विषय में बताया जाता है तो उनके मन में शरीर की यही कल्पना बनी रहती है।
ऐसे भौतिकतावादी पुरुषों के लिए विराट भौतिक जगत का स्वरूप ही परमतत्व है। फलस्वरूप वे परमेश्वर को निराकार मानते हैं और भौतिकता में इतने तल्लीन रहते हैं कि भौतिक पदार्थ से मुक्ति के बाद व्यक्तित्व (स्वरूप) बनाए रखने के विचार से ही वे डरते हैं।
मनुष्य को भौतिक जगत के प्रति आसक्ति की तीनों अवस्थाओं से छुटकारा पाना होता है, ये हैं- आध्यात्मिक जीवन की उपेक्षा, आध्यात्मिक साकार रूप का भय तथा जीवन की हताशा से उत्पन्न शून्यवाद की कल्पना।
जीवन की इन तीनों अवस्थाओं से छुटकारा पाने के लिए प्रामाणिक गुरु के निर्देशन में भगवान की शरण ग्रहण करना और भक्तिमय जीवन के नियम तथा विधि-विधानों का पालन करना आवश्यक है। जीवन की अंतिम अवस्था भाव या दिव्य ईश्वरीय प्रेम कहलाती है।

प्रेम अवस्था में भक्त भगवान की दिव्य प्रेमाभक्ति में निरंतर लीन रहता है। अत: भक्ति की मंद विधि से प्रामाणिक गुरु के निर्देश में सर्वोच्च अवस्था प्राप्त की जा सकती है और समस्त भौतिक आसक्ति, व्यक्तिगत आध्यात्मिक स्वरूप के भय तथा शून्यवाद से उत्पन्न हताशा से मुक्त हुआ जा सकता है। तभी मनुष्य को अंत में भगवान के धाम की प्राप्ति हो सकती है।
