Edited By Jyoti,Updated: 07 Oct, 2022 04:01 PM

अनुवाद: कर्मेन्द्रियां जड़ पदार्थ की अपेक्षा श्रेष्ठ हैं, मन इंद्रियों से बढ़कर है, बुद्धि मन से भी उच्च है और वह (आत्मा) बुद्धि से भी बढ़कर है।
शास्त्रों की बात,जानें धर्म ेके साथ
श्रीमद्भगवद्गीता यथारूप
यथारूप
व्याख्याकार :
स्वामी प्रभुपाद
साक्षात स्पष्ट ज्ञान का उदाहरण भगवद्गीता
श्रीमद्भगवद्गीता श्लोक-
इंद्रियाणि पराण्याहुरिन्द्रियेभ्य: परं मन:।
मनसस्तु परा बुद्धिर्यो बुद्धे: परतस्तु स:।। 42।।
अनुवाद: कर्मेन्द्रियां जड़ पदार्थ की अपेक्षा श्रेष्ठ हैं, मन इंद्रियों से बढ़कर है, बुद्धि मन से भी उच्च है और वह (आत्मा) बुद्धि से भी बढ़कर है।

1100 रुपए मूल्य की जन्म कुंडली मुफ्त में पाएं । अपनी जन्म तिथि अपने नाम , जन्म के समय और जन्म के स्थान के साथ हमें 96189-89025 पर वाट्स ऐप करें

तात्पर्य: इंद्रियां काम के कार्यकलापों के विभिन्न द्वार हैं। काम का निवास शरीर में है, किंतु उसे इंद्रिय रूपी झरोखे प्राप्त हैं। अत: कुल मिलाकर इंद्रियां शरीर से श्रेष्ठ हैं। श्रेष्ठ चेतना या कृष्णभावनामृत होने पर ये द्वार काम में नहीं आते। कृष्णभावनामृत में आत्मा भगवान के साथ सीधा संबंध स्थापित करती है, अत: यहां पर वॢणत शारीरिक कार्यों की श्रेष्ठता परमात्मा में आकर समाप्त हो जाती है।

शारीरिक कर्म का अर्थ है इंद्रियों के कार्य और इनके अवरोध का अर्थ है सारे शारीरिक कर्मों का अवरोध लेकिन मन सक्रिय रहता है, अत: शरीर के स्थिर रहने पर भी मन कार्य करता रहता है- यथा स्वप्र के समय मन कार्यशील रहता है किंतु मन पर भी बुद्धि की संकल्पशक्ति होती है और बुद्धि के ऊपर स्वयं आत्मा है। मनुष्य को चाहिए कि बुद्धि द्वारा आत्मा की स्वाभाविक स्थिति को ढूंढे और मन को निरंतर कृष्णभावनामृत में लगाए रखे। (क्रमश:)