Edited By Sarita Thapa,Updated: 18 Feb, 2026 08:07 AM

नई दिल्ली (इंट): मंदिरों और धार्मिक स्थलों में महिलाओं के प्रवेश को लेकर भेदभाव के सवाल पर अब सुप्रीम कोर्ट की संवैधानिक पीठ अंतिम फैसला सुनाने की तैयारी में है।
नई दिल्ली (इंट): मंदिरों और धार्मिक स्थलों में महिलाओं के प्रवेश को लेकर भेदभाव के सवाल पर अब सुप्रीम कोर्ट की संवैधानिक पीठ अंतिम फैसला सुनाने की तैयारी में है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि 7 अप्रैल से 9 सदस्यीय संविधान पीठ इस संवेदनशील मुद्दे पर अंतिम सुनवाई शुरू करेगी। साथ ही पत्रकारों को 14 मार्च तक अपने लिखित तर्क दाखिल करने के निर्देश दिए गए हैं।
सबरीमाला सहित कई मामलों की होगी एक साथ सुनवाई
यह सुनवाई केवल केरल के सबरीमाला मंदिर तक सीमित नहीं रहेगी बल्कि उन सभी याचिकाओं को शामिल करेगी, जिनमें धार्मिक स्थलों पर महिलाओं के प्रवेश को लेकर भेदभाव का मुद्दा उठाया गया है। अदालत का मानना है कि यह मामला केवल आस्था का नहीं बल्कि संविधान में दिए गए मौलिक अधिकारों और समानता के सिद्धांत से भी जुड़ा है। केरल सरकार ने अदालत में साफ कहा है कि वह राज्य में महिलाओं के प्रवेश से जुड़े किसी भी भेदभावपूर्ण नियम का समर्थन नहीं करेगी। सरकार का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले का पूरी तरह पालन किया जाएगा और संविधान से ऊपर कोई परंपरा नहीं हो सकती।
कोर्ट की टिप्पणी: अदालत बन जाती है राजनीतिक अखाड़ा
गौरतलब है कि वर्ष 2018 में सुप्रीम कोर्ट की 5 सदस्यीय पीठ ने 4:1 के बहुमत से सबरीमाला मंदिर में 10 से 50 वर्ष की महिलाओं के प्रवेश पर लगी रोक को असंवैधानिक करार दिया था। बाद में इस फैसले की समीक्षा याचिकाएं दाखिल की गईं, जिसके बाद मामला बड़ी संवैधानिक पीठ को सौंपा गया। सुनवाई के दौरान अदालत ने यह भी टिप्पणी की कि चुनाव नजदीक आते ही कई संवेदनशील मुद्दे राजनीतिक अखाड़ा बन जाते हैं। न्यायालय ने साफ किया कि वह किसी भी तरह के राजनीतिक दबाव से ऊपर उठकर केवल संविधान के दायरे में रह कर फैसला करेगा। अदालत ने तीखी टिप्पणी करते हुए कहा कि न्याय करते समय वह यह नहीं देखती कि याचिकाकर्त्ता कौन है, उसका संबंध क्या है या उसकी राजनीतिक बैकग्राऊंड क्या है। संविधान के सामने सभी समान हैं और फैसला भी उसी आधार पर होगा।
महिलाओं के अधिकार बनाम परंपरा
यह मामला एक बार फिर महिलाओं के समान अधिकार और सदियों पुरानी धार्मिक परम्पराओं के बीच टकराव को सामने लाता है। एक ओर आस्था का सवाल है, तो दूसरी ओर संविधान द्वारा प्रदत्त समानता और गरिमा का अधिकार। 7 अप्रैल से शुरू होने वाली
इस अंतिम सुनवाई पर पूरे देश की नजरें टिकी हैं।
यह फैसला न केवल सबरीमाला, बल्कि देश के अन्य धार्मिक स्थलों में महिलाओं के अधिकारों की दिशा भी तय करेगा। अदालत का निर्णय आने वाले वर्षों में सामाजिक और कानूनी बहस की दिशा तय करने वाला माना जा रहा है।
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