Edited By Tanuja,Updated: 10 Jan, 2026 05:44 PM

डेनमार्क के सांसद रासमुस यारलोव ने ग्रीनलैंड को लेकर अमेरिकी धमकियों को “अस्वीकार्य” बताया। उन्होंने कहा कि ग्रीनलैंड को चीन से नहीं, बल्कि अमेरिका से खतरा है। ट्रंप की बयानबाज़ी से नाटो और यूरोपीय सुरक्षा पर सवाल खड़े हो गए हैं।
International Desk:डेनमार्क के कंज़र्वेटिव सांसद रासमुस यारलोव ने ग्रीनलैंड को लेकर अमेरिका की ओर से दिए जा रहे सैन्य संकेतों और धमकियों की कड़ी निंदा करते हुए इसे “बेहद चिंताजनक और अस्वीकार्य” बताया है। उन्होंने कहा कि किसी मित्र और सहयोगी देश को सैन्य बल की धमकी देना अभूतपूर्व है।यारलोव ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की टिप्पणियों पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि डेनमार्क या ग्रीनलैंड को चीन से कोई खतरा नहीं, बल्कि वास्तविक खतरा अमेरिका से पैदा हो रहा है। उन्होंने कहा, “यह चौंकाने वाला है कि एक ऐसा देश, जिसने हमेशा अमेरिका का साथ दिया, आज उसी से धमकियां सुन रहा है। अगर डेनमार्क निशाना बन सकता है, तो कोई भी देश सुरक्षित नहीं है।”
ग्रीनलैंड के संदर्भ में उन्होंने साफ कहा कि वहां न तो कोई शत्रुता है और न ही कोई बाहरी खतरा। चीन के कथित खतरे को उन्होंने “फर्जी कहानी” करार देते हुए कहा कि चीन की वहां न तो कोई कूटनीतिक मौजूदगी है, न खनन परियोजनाएं, न स्वामित्व और न ही कोई सैन्य आधार।यारलोव ने यह भी याद दिलाया कि अमेरिका को पहले से ही ग्रीनलैंड में व्यापक सैन्य पहुंच हासिल है। शीत युद्ध के दौरान हुए 1951 के समझौते के तहत अमेरिका को वहां सैन्य ठिकाने बनाने, सैनिक तैनात करने और हवाई व समुद्री गतिविधियों को नियंत्रित करने का अधिकार मिला हुआ है। इसके बावजूद, अमेरिका ने अपनी सैन्य मौजूदगी को 15,000 सैनिकों से घटाकर मात्र 150 कर दिया है।
उन्होंने कहा कि ग्रीनलैंड के भविष्य का फैसला वहां के 57,000 निवासियों का अधिकार है। डेनमार्क अधिकारियों के अनुसार, ग्रीनलैंड को स्वतंत्रता पर जनमत संग्रह कराने का संवैधानिक अधिकार प्राप्त है। हाल ही में हुए एक सर्वे में 85 प्रतिशत ग्रीनलैंडवासियों ने अमेरिकी कब्जे के विचार का विरोध किया था। विशेषज्ञों का मानना है कि ट्रंप प्रशासन की आक्रामक बयानबाज़ी न केवल डेनमार्क-अमेरिका संबंधों को तनावपूर्ण बना रही है, बल्कि नाटो की एकता और यूरोपीय सुरक्षा ढांचे पर भी गंभीर सवाल खड़े कर रही है।