दुनिया को तबाह करने पर तुले ट्रंप ! मिडल ईस्ट-यूरोप में की आक्रमण की तैयारी, ईरान और डेनमार्क बोले- हम भी जंग को तैयार

Edited By Updated: 08 Jan, 2026 01:20 PM

dozens of us military planes surge to middle east as iran boosts air defenses

मध्य पूर्व में तनाव के बीच अमेरिका ने दर्जनों सैन्य विमान क्षेत्र में तैनात किए हैं, जबकि ईरान ने वायु रक्षा अभ्यास तेज कर दिए हैं। इसी दौरान डेनमार्क ने ट्रंप के संभावित हमले पर कड़ा रुख अपनाया और अमेरिका ने 66 वैश्विक संगठनों से अलग होने का ऐलान...

International Desk: दुनिया एक बार फिर बड़े भू-राजनीतिक संकट के मुहाने पर खड़ी दिख रही है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की आक्रामक नीतियों और बयानों के बीच मिडिल ईस्ट से लेकर यूरोप तक तनाव तेज़ी से बढ़ रहा है। अमेरिका ने दर्जनों सैन्य विमानों को मध्य पूर्व की ओर तैनात कर अपनी युद्ध क्षमता को मजबूत किया है, जबकि ईरान ने खुलकर वायु रक्षा और मिसाइल अभ्यास के जरिए जवाबी तैयारी दिखा दी है। उधर, ग्रीनलैंड विवाद के बीच डेनमार्क ने भी साफ चेतावनी दी है कि उसकी ज़मीन पर हमले की सूरत में वह “बिना इंतज़ार किए लड़ाई में उतरेगा।”इन घटनाओं ने न सिर्फ युद्ध की आशंका बढ़ाई है, बल्कि वैश्विक व्यापार, तेल बाज़ार और आर्थिक स्थिरता पर भी गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

 

अमेरिका ने मिडल ईस्ट में सैन्य मौजूदगी बढ़ाई
मिडल ईस्ट में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव के बीच अमेरिका ने अपनी सैन्य मौजूदगी को और मजबूत करते हुए दर्जनों सैन्य विमानों को पूर्व की ओर तैनात किया है। ओपन-सोर्स इंटेलिजेंस और फ्लाइट ट्रैकिंग डेटा के अनुसार, KC-135 स्ट्रैटोटैंकर, KC-46A पेगासस जैसे एयर-रिफ्यूलिंग विमान और C-17 ग्लोबमास्टर III व C-5M गैलेक्सी जैसे भारी परिवहन विमान यूरोप से हटाकर मध्य पूर्व की दिशा में भेजे गए हैं। इन विमानों को कतर के अल-उदीद एयरबेस जैसे रणनीतिक ठिकानों पर तैनात किए जाने की संभावना है, जिससे अमेरिका की लंबी दूरी की हवाई कार्रवाइयों और लॉजिस्टिक सपोर्ट क्षमता बढ़ेगी। पेंटागन ने इस तैनाती पर आधिकारिक टिप्पणी नहीं की है, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि यह कदम क्षेत्र में किसी भी आकस्मिक स्थिति से निपटने की तैयारी का संकेत है।यह तैनाती  2025 में हुए ऐसे ही सैन्य मूवमेंट की याद दिलाती है, जिसे उस समय अमेरिका ने “रक्षात्मक तैयारी” करार दिया था। तब भी इन तैनातियों के बावजूद सीधा सैन्य टकराव नहीं हुआ था।

 

ईरान की जवाबी तैयारी
उधर, ईरान ने भी अपनी वायु रक्षा को मजबूत करते हुए 4 जनवरी को कई शहरों जिसमें तेहरान भी शामिल है में वायु रक्षा और मिसाइल अभ्यास किए। इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) ने उन्नत रडार सिस्टम और सतह से हवा में मार करने वाली मिसाइल इकाइयों को तैनात किया। ईरानी अधिकारियों के अनुसार, यह कदम राष्ट्रीय प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाने के लिए उठाया गया है। विश्लेषकों का कहना है कि अमेरिका और ईरान दोनों ही पक्ष फिलहाल सीधे संघर्ष से बचते हुए तैयारी की स्थिति में हैं, जिससे क्षेत्र में एक नाजुक सामरिक संतुलन बना हुआ है।

 

डेनमार्क की सख्त चेतावनी
इसी बीच, डेनमार्क ने स्पष्ट किया है कि यदि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने उसके क्षेत्र पर हमला करने का फैसला किया, तो वह “बिना इंतजार किए तुरंत लड़ाई में उतर जाएगा।” यह बयान नाटो सहयोगियों के बीच बढ़ती बेचैनी को दर्शाता है।

 

ईरान और अमेरिका के बीच तनाव क्यों ? 
अमेरिका का आरोप है कि ईरान परमाणु हथियार बनाने के करीब है। ईरान कहता है कि उसका कार्यक्रम केवल बिजली और ऊर्जा के लिए है।  ट्रंप ने 2018 में परमाणु समझौते (JCPOA) से अमेरिका को बाहर कर लिया।  अमेरिकी सैन्य तैनाती भी इसका कारण है। अमेरिका के सैन्य अड्डे कतर, बहरीन, यूएई और इराक में हैं।  ईरान इसे अपने चारों ओर घेराबंदी मानता है हालिया अमेरिकी विमान तैनाती युद्ध नहीं, दबाव और चेतावनी है। इसके अलावा ईरान इजराइल को मान्यता नहीं देता। अमेरिका इजराइल का सबसे बड़ा समर्थक है। अगर इजराइल–ईरान टकराव बढ़ा, तो अमेरिका खिंच सकता है। ईरान समर्थित हिज़्बुल्लाह (लेबनान), हूती (यमन) जैसे संगठन   भी दोनों देशों में तनाव का कारण हैं। अमेरिका कहता है ये उसके हितों पर हमला करते हैं । ईरान इसे “प्रतिरोध” बताता है।


डेनमार्क और अमेरिका में युद्ध की बात क्यों ?
ग्रीनलैंड विवादः ग्रीनलैंड डेनमार्क का स्वायत्त क्षेत्र है। ट्रंप पहले इसे “खरीदने” की बात कर चुके हैं। डेनमार्क इससे साफ इनकार कर चुका है और कहा कि हम  “हम तुरंत लड़ेंगे” । डेनमार्क ने कहा कि “अगर हमारी ज़मीन पर कोई हमला करेगा तो हम इंतज़ार नहीं करेंगे”। यह बयान रक्षा नीति का हिस्सा है, युद्ध की धमकी नहीं। डेनमार्क और अमेरिका दोनों NATO सहयोगी हैं। अमेरिका अगर डेनमार्क पर हमला करे तो  खुद NATO से टकराएगा और  सभी यूरोपीय देश सामने आ जाएंगे इसलिए हमला नामुमकिन है। विवाद बढ़ने की वजह  ट्रंप की आक्रमक बयानबाजी को माना जा रहा हैा।   

 

वैश्विक व्यापार पर असर
इन घटनाओं के समानांतर, अमेरिका ने भारत-फ्रांस के नेतृत्व वाले अंतरराष्ट्रीय सौर गठबंधन (ISA) समेत 66 अंतरराष्ट्रीय संगठनों और समझौतों से बाहर निकलने की घोषणा की है।  इस अनिश्चिचता  के दौर में ट्रंप ने  रूस से तेल खरीदने वाले देशों पर 500% तक टैरिफ की धमकी दी है।  इनमें भारत, चीन, ब्राज़ील मुख्य निशाने पर हैं।  निवेशकों में डर है कि तनाव बढ़ते ही Market Uncertainty से शेयर बाजार में गिरावट आएगी और निवेशक सुरक्षित जगहों (Gold, Dollar) की ओर भागते हैं। हर देश अपने फायदे की नीति अपनाएगा। 

 

तेल और ऊर्जा बाज़ार में उथल-पुथल
ईरान मध्य-पूर्व का बड़ा तेल उत्पादक है।  तनाव बढ़ते ही  कच्चे तेल की कीमतें बढ़ती हैं।  शिपिंग बीमा और भाड़ा महंगा होता है। भारत, चीन जैसे आयातक देशों की महंगाई बढ़ती है।  पेट्रोल-डीजल, ट्रांसपोर्ट और बिजली महंगी हो जाएगी।वैश्विक अर्थव्यवस्था फिलहाल ‘हाई रिस्क–लो कॉन्फिडेंस’ मोड में है।


  शिपिंग रूट्स पर खतरा

  • होर्मुज़ जलडमरूमध्य से दुनिया का ~20% तेल गुजरता है। किसी भी सैन्य तनाव से जहाज़ों की आवाजाही धीमी
  • और  सप्लाई चेन में देरी से यूरोप और एशिया में माल देर से पहुँचेगा। ऑटो, इलेक्ट्रॉनिक्स, दवाइयों की लागत बढ़ेगी


 
 

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