पशुओं पर सफल ट्रायल से डेंगू के इलाज की उम्मीद बढ़ी

Edited By Updated: 16 Mar, 2023 05:42 PM

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पशुओं पर सफल ट्रायल से डेंगू के इलाज की उम्मीद बढ़ी

डेंगू के इलाज की तलाश में लगे वैज्ञानिकों ने बंदरों पर शुरुआती ट्रायल में सफलता हासिल कर ली है. अगर यह शोध सफल रहा तो पहली बार डेंगू से बचाव और उसके इलाज का एक असरदार रास्ता लोगों के सामने होगा.डेंगू मच्छरों से फैलता है और हर साल करोड़ों लोगों को प्रभावित करता है. इसके लक्षण इतने कठोर होते हैं कि उनकी वजह से इस बीमारी को "हड्डियां तोड़ देने वाले बुखार" भी कहा जाता है. यह दर्जनों देशों में एंडेमिक यानी स्थानिक रोग बन चुका है लेकिन अभी तक इसके किसी इलाज की खोज नहीं हो पाई है. दो टीके जरूर विकसित किए गए हैं लेकिन अभी उनके इस्तेमाल की पूरी दुनिया में अनुमति नहीं मिली है. परीक्षणों के प्रोत्साहक नतीजे दो सालों पहले शोधकर्ताओं ने एक शोध प्रकाशित किया जिसमें दिखाया गया कि एक कंपाउंड प्रभावी रूप से डेंगू के वायरस को सेल कल्चर में और चूहों में फैलने से रोक सकता है. यह कंपाउंड ऐसा दो प्रोटीनों के बीच संपर्क को रोक कर करता है. अब इसी टीम ने इस कंपाउंड को और प्रभावी बनाया है और उसका चूहों और बंदरों दोनों में परीक्षण किया है. जॉनसन एंड जॉनसन की दवा कंपनी जानसेन में उभरते रोगाणुओं के विशेषज्ञ मारनिक्स वान लूक ने बताया कि इन परीक्षणों के नतीजे "बहुत प्रोत्साहक" रहे हैं. उन्होंने बताया की रीसस बंदरों में जब जेएनजे-1802 नाम से जाने जाने वाले इस कंपाउंड की ज्यादा खुराक दी गई तो उसने "वायरस की प्रतिकृति बनाने की प्रक्रिया को पूरी तरह से ब्लॉक कर दिया." कंट्रोल जानवरों में वायरल आरएनए संक्रमण के दो से तीन दिनों के भीतर पाया गया. बंदरों में इस कंपाउंड की डेंगू वायरस की चार नस्लों में से सबसे ज्यादा फैलने वाली दो नस्लों के आगे फिर से जांच की गई. इस बार इलाज की जगह डेंगू से बचाव की शक्ति की जांच की गई. वायरस की चारों नस्लों से सुरक्षा जरूरी वान लूक ने बताया कि चूहों में इलाज और बचाव दोनों के लिए इसका परीक्षण किया गया और चारों नस्लों के आगे किया गया. नतीजे सफल रहे. डेंगू से काफी तेज फ्लू-जैसे लक्षण हो सकते हैं जो कभी कभी इतने गंभीर हो जाते हैं कि उनसे जान भी चली जाती है. चूंकि वायरस की चार अलग अलग नस्लें होती हैं इसलिए किसी एक नस्ल से संक्रमण हो जाने से दूसरी नस्लों से अपने आप सुरक्षा नहीं मिलती है. और डेंगू अगर दूसरी बार हो जाए तो अक्सर वो ज्यादा गंभीर होता है. शोधकर्ताओं ने चेतावनी दी है कि एक ज्यादा गर्म और ज्यादा नमी वाले वातावरण की वजह से मच्छरों द्वारा छोड़े गए वायरसों के फैलने की ज्यादा संभावना है. ऐसा वातावरण मच्छरों के लिए ज्यादा आतिथ्यकारी होता है. चूंकि अभी तक डेंगू का कोई इलाज उपलब्ध नहीं है, इसलिए इस समय सारी कोशिशें संक्रमण कम करने पर केंद्रित हैं. इनमें मच्छरों को एक बैक्टीरिया से संक्रमित कर देना भी शामिल है. दोबारा इन्फेक्शन रोकने का सवाल डेंगवैक्सिया नाम के एक टीके की कुछ ही देशों में इस्तेमाल की इजाजत है और वह भी एक ही नस्ल के आगे प्रभावी है. क्यूडेंगा नाम के एक और टीके को पिछले साल दिसंबर में यूरोपीय संघ ने इस्तेमाल की इजाजत दे दी थी. अब इसे ब्रिटेन और इंडोनेशिया ने भी हरी झंडी दिखा दी है. लेकिन अभी भी इलाज को लेकर कई सवाल हैं जिनके जवाब ढूंढे जाने हैं. इनमें यह सवाल भी शामिल है कि इससे कहीं दोबारा इन्फेक्शन के आगे कमजोरी बढ़ तो नहीं जाएगी. जब किसी को डेंगू होता है तो आम तौर पर उसके खून में वायरस की मौजूदगी एक मजबूत इम्यून प्रतिक्रिया को जन्म देती है जो उन्हें भविष्य में दोबारा इन्फेक्शन होने से बचाती है. लेकिन कुछ लोगों में यह इम्यून प्रतिक्रिया कमजोर होती है जिसकी वजह से उन्हें दोबारा इन्फेक्शन होने का खतरा ज्यादा रहता है. अभी तक यह स्पष्ट नहीं हुआ है कि वायरस को प्रतिकृति बनाने से रोकने या कमजोर करने से दोबारा इन्फेक्शन होने की वही संभावना जन्म लेती है या नहीं. शोधकर्ताओं को मानव ट्रायल की तरफ बढ़ने से पहले परीक्षण के मौजूदा चरण के सेफ्टी डाटा को पेश करना होगा. वान लूक यह बताने में झिझक रहे थे कि इलाज के इस्तेमाल के लिए कब तक उपलब्ध हो जाने की संभावना है. उन्होंने कहा, "इस सवाल के जवाब को देने के लिए हम उस विज्ञान और डाटा से मार्गदर्शन लेते हैं जो हमारे काम से सामने आता है." सीके/एए (एएफपी)

यह आर्टिकल पंजाब केसरी टीम द्वारा संपादित नहीं है, इसे DW फीड से ऑटो-अपलोड किया गया है।

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