तंत्र विज्ञान: यंत्र शक्ति को योग्य तांत्रिक से प्राण-प्रतिष्ठित करा लें, होंगे चमत्कार

Edited By Updated: 14 Oct, 2016 01:48 PM

yantra

तंत्र विज्ञान में प्राचीन काल से यंत्र शक्ति की महिमा गाई गई है। यंत्र शक्ति का ठोस आधार है। इसे तो अब आधुनिक विज्ञान ने भी मान्यता दे दी है।

तंत्र विज्ञान में प्राचीन काल से यंत्र शक्ति की महिमा गाई गई है। यंत्र शक्ति का ठोस आधार है। इसे तो अब आधुनिक विज्ञान ने भी मान्यता दे दी है। आधुनिक विज्ञान कहता है कि मानव शरीर एक यंत्र है। तांत्रिक गुरुओं ने कहा है कि यंत्र ताम्बे के पतरे पर उभरा हुआ होना चाहिए। इसमें भी विज्ञान का आधार है। ताम्बे में विद्युत वाहक शक्ति अधिक है। ताम्बा अन्य सभी धातुओं की अपेक्षा विद्युत अधिक तीव्रता से ग्रहण करता है। क्योंकि यह सुचालक होता है। तांबा शीघ्र ही वातावरण, मौसम और तापमान से प्रभावित होता है, यह शुभ किरणों को शीघ्र ग्रहण कर प्रसारित कर देता है। यंत्र शब्द से सभी लोग भली भांति परिचित हैं। जहां यंत्र एक मशीन का सूचक है वहीं तंत्र शास्त्र में यह इष्ट का सूचक भी है। यंत्र शब्द ‘यम्’ धातु और ‘त्र’ प्रत्यय से मिलकर बना है, जिसका अर्थ है जो साधक अपनी प्रवृत्तियों को नियमित करके अपने इष्ट की साधना करता है उसकी रक्षा करने वाला यंत्र है। 


यंत्र इष्ट का प्रतीक देवों का आवास, सृष्टि का मूल, समस्त सिद्धियों का द्वार, साधना का एकमात्र आधार, पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश का समन्वय एव साधक की आकांक्षाओं की पूर्ति शीघ्र करने वाला है। तंत्र में यंत्र का बड़ा ही महत्व है। कहा गया है कि


‘बिना यंत्रेण पूजायां देवता न प्रसीदति’
अर्थात बिना यंत्र की पूजा के देवता प्रसन्न नहीं होते।


‘देहात्मनोर्यथा भेदा यंत्र देवतयोस्तथा’ 
अर्थात जिस प्रकार शरीर और आत्मा का संबंध है ठीक उसी प्रकार यंत्र और देवता का घनिष्ठ संबंध माना गया है।


यंत्र के विषय में शास्त्रों में कहा गया है

‘काम-क्रोधादि-दोषोत्थ-सर्वदु:ख-नियंत्रणात्। यंत्रमित्याहुरेतस्मिन् देव: प्रीणाति पूजित:।’ 
अर्थात काम क्रोधादि दोषों से उत्पन्न सभी दुखों को नियंत्रित करने के कारण ही इसे यंत्र कहा गया है और यंत्र की साधना करने से इष्ट प्रसन्न होकर अनेक सफलताओं को प्रदान करते हैं।


यंत्र लेखन के लिए अनार अथवा चमेली के वृक्ष की कलम को उपयुक्त माना गया है। यंत्र लेखन में मुख्य रूप से अष्टगंध, पंचगंध, गंधत्रय, यक्षकर्दम, शुद्ध केसर इत्यादि प्रयुक्त होते हैं। अष्टगंध में अगर, तगर, गोरोचन, कस्तूरी,सिंदूर, लाल चंदन और केसर। पंचगंध में गोरोचन, चंदन, केसर, कस्तूरी और देशी कपूर। गंधत्रय में सिंदूर, हल्दी और कुमकुम। यक्षकर्दम में अगर, केसर, कपूर, कस्तूरी, चंदन, गोरोचन, हिंगुल, रतांजनी, अम्बर, स्वर्णपत्र, मिर्च और कंकोल सम्मिलित होते हैं।

 
लेखनकर्ता को उपर्युक्त शुभ वारादि का निर्णय करके उपयुक्त पत्र पर, उपयुक्त कलम से, उपयुक्त लेखन स्याही से यंत्र लेखन करना चाहिए। तदुपरांत यंत्र की सिद्धि यथाविधि करनी चाहिए। 


यंत्र अनेक प्रकार के होते हैं। उद्देश्य के आधार पर इन्हें निष्काम और सकाम, आयाम के आधार पर इन्हें भू-पृष्ठ, मेरू-पृष्ठ, पाताल, मेरू-पस्तार, कूर्म-पृष्ठ, गोलाकार, षेण्डुलम, स्वस्तिकाकार इत्यादि प्रयोग के आधार पर इन्हें धारण यंत्र, आसन यंत्र, छत्र यंत्र, दर्शन यंत्र, अभिषेक यंत्र इत्यादि, यंत्र निर्माण के आधार पर इन्हें रेखीय, वर्णात्मक और अकात्मक इत्यादि भागों में विभक्त किया जाता है किन्तु तंत्र शास्त्र धर्म की सीमाओं से परे है। तंत्र सर्वधर्म समभाव के सिद्धांत का पालन करता है।


यंत्र ताम्रपत्र, भोजपत्र इत्यादि पर बनाए जाते हैं। वशीकरण के लिए भोजपत्र पर, मोहन कर्म के लिए रजतपत्र पर, मारण कर्म के लिए अयसपत्र पर, स्तम्भन के लिए पीतल पत्र पर, विद्वेषण के लिए शव के कफन पर, आकर्षण के लिए सीसे के पत्र पर, राज्य प्राप्ति हेतु पलाश के पत्ते पर, पुत्र प्राप्ति के लिए पीपल के पत्ते पर, पत्नी प्राप्ति हेतु नागर बेल के पत्ते पर, देश प्राप्ति के लिए कमल के पत्ते पर, ऐश्वर्य प्राप्ति के लिए वटवृक्ष के पत्ते पर, मोक्ष प्राप्ति के लिए ताड़पत्र पर, शांति के लिए मुलहठी के पत्ते पर, काम उद्देश्य हेतु भोजपत्र पर तथा सुस्वाद भोजन हेतु केले के पत्ते पर यंत्रों का निर्माण कराना चाहिए।


तांत्रिक यंत्रों को शुभ मुहूर्त में लिखना आवश्यक है। धान्य लाभ के लिए फाल्गुन माह में, समृद्धि के लिए पौष माह में, धन लाभ के लिए आश्विन माह में, स्वर्ण लाभ के लिए कार्तिक माह में, अभिलाषा पूर्ति के लिए श्रावण माह में, पुत्र प्राप्ति के लिए भाद्रपद माह में तथा उग्र कर्म के लिए ज्येष्ठ माह में यंत्र को लिखना चाहिए।


यंत्र लेखन के लिए शुक्ल पक्ष को शास्त्रों में उत्तम कहा गया है। धन प्राप्ति के लिए द्वितीया, सप्तमी, द्वादशी तिथियों को, बुद्धि प्राप्ति के लिए द्वितीया, सप्तमी, द्वादशी तिथियों को, वशीकरण के लिए प्रतिपदा, षष्ठी, एकादशी तिथियों को, आकर्षण के लिए चतुर्थी, नवमी, चतुर्दशी तिथियों को, मारण और उच्चाटन के लिए चतुर्थी, नवमी, चतुर्दशी तिथियों को, शुभ उद्देश्यों के लिए पंचमी, दशमी तथा पूर्णिमा को, मोक्ष एवं आध्यात्मिक उद्देश्यों के लिए तृतीया, अष्टमी तथा त्रयोदशी तिथियों को यंत्र लेखन करना चाहिए। शास्त्रों में यंत्र लेखनकर्ता के वर्ण के आधार पर यंत्र लेखन के दिवस का निर्धारण किया गया है। 


ब्राह्मणों के लिए वीरवार और शुक्रवार, क्षत्रियों के लिए रविवार और मंगलवार, वैश्यों के लिए सोमवार तथा शुद्रों के लिए बुधवार, इस कार्य हेतु उपयुक्त माने गए हैं। उद्देश्य के आधार पर यंत्र लेखन का प्रहर निश्चित किया गया है। प्रथम प्रहर सकाम कर्म हेतु, द्वितीय प्रहर वशीकरण हेतु, तृतीय प्रहर उच्चाटन हेतु, चतुर्थ प्रहर मारण उद्देश्य हेतु तथा मध्य रात्रि शांति कर्म हेतु उचित माने गए हैं ये यंत्र ताम्र पत्र पर बने बनाए बाजार में भी मिल जाते हैं। आप इन्हें किसी योग्य तांत्रिक के प्राण-प्रतिष्ठित करा लें।
 

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