Edited By Sahil Kumar,Updated: 06 Jan, 2026 06:42 PM

देश के केंद्रीय कर्मचारियों और पेंशनभोगियों की नजर आठवें वेतन आयोग पर टिकी है। तकनीकी रूप से आयोग 1 जनवरी 2026 से प्रभावी माना जाएगा, लेकिन सरकारी प्रक्रिया और कैबिनेट मंजूरी में समय लगने के कारण बढ़ी हुई सैलरी 2027 या 2028 तक बैंक खातों में आ सकती...
8th Pay Commission: देशभर के केंद्रीय कर्मचारियों और पेंशनभोगियों की नजर अब आठवें वेतन आयोग पर टिकी है। नया साल शुरू होते ही सरकारी दफ्तरों और कर्मचारी संगठनों में चर्चाओं का बाजार गर्म है। सवाल एक ही है, बढ़ी हुई सैलरी और बकाया एरियर कब बैंक खाते में आएगा? एक्सपर्ट्स के मुताबिक, तकनीकी रूप से अधिकार 1 जनवरी 2026 से बन चुके हैं, लेकिन प्रशासनिक प्रक्रिया में देरी के कारण भुगतान 2027 या 2028 तक हो सकता है।
बढ़ी हुई सैलरी कब तक आएगी?
ऑल इंडिया एनपीएस इम्प्लॉइज फेडरेशन के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. मंजीत पटेल के अनुसार, नियमों के अनुसार आठवां वेतन आयोग 1 जनवरी 2026 से प्रभावी होगा। इसका मतलब तकनीकी रूप से कर्मचारियों का हक इसी तारीख से बनता है। हालांकि, सरकारी प्रक्रिया में समय लगता है। रिपोर्ट तैयार होने, कैबिनेट की मंजूरी और लागू होने की प्रशासनिक प्रक्रिया में लगभग 18 से 24 महीने लग सकते हैं। इसके अनुसार, कर्मचारियों के बैंक खाते में बढ़ी हुई सैलरी जुलाई 2027 से जनवरी 2028 के बीच आने की उम्मीद है।
एरियर का भुगतान
कर्मचारियों के बीच एक चिंता यह भी है कि एरियर किस्तों में मिलेगा या नहीं। डॉ. मंजीत पटेल ने स्पष्ट किया कि केंद्र सरकार का इतिहास यह दिखाता है कि एरियर आमतौर पर एकमुश्त ही दिया गया है। आठवां वेतन आयोग 1 जनवरी 2026 से लागू माना जाएगा, एरियर की गणना भी इसी तारीख से की जाएगी। इसका सीधा मतलब यह है कि चाहे फैसला 2027 या 2028 में आए, कर्मचारियों को पूरा एरियर एक साथ मिलेगा, न कि हिस्सों में।
हालांकि एरियर का एकमुश्त भुगतान सुखद है, लेकिन आयोग के लागू होने में देरी से कर्मचारियों को आर्थिक नुकसान हो रहा है। यदि आयोग समय पर लागू हो जाता, तो बढ़ा हुआ हाउस रेंट अलाउंस (HRA) और ट्रांसपोर्ट अलाउंस (TA) समय पर मिलता। विशेषज्ञों के अनुसार, HRA और TA का एरियर आमतौर पर पिछली तारीखों से नहीं दिया जाता। इसका मतलब है कि लेवल-8 के अधिकारी को इस देरी के कारण करीब 3.5 से 4 लाख रुपये का नुकसान हो सकता है। साथ ही, महंगाई भत्ता (DA) पहले ही 50% पार कर चुका है, जिसे नियमों के अनुसार बेसिक सैलरी में मर्ज होना चाहिए था। यह भी न होने से कर्मचारी पिछले दो सालों से अपनी वास्तविक हकदार सैलरी से कम प्राप्त कर रहे हैं।