Edited By Mehak,Updated: 06 Mar, 2026 04:03 PM
पश्चिम एशिया में बढ़ते युद्ध और समुद्री हमलों के खतरे के बीच भारत ने अपनी ऊर्जा आपूर्ति सुरक्षित रखने के लिए अमेरिका से समुद्री सुरक्षा सहयोग पर बातचीत शुरू की है। खासतौर पर होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरने वाले तेल और गैस के जहाजों की सुरक्षा पर जोर...
नेशनल डेस्क : पश्चिम एशिया (मिडिल ईस्ट) में बढ़ते सैन्य तनाव और समुद्री हमलों की आशंका के बीच भारत ने अपनी ऊर्जा आपूर्ति को सुरक्षित रखने के लिए अहम पहल शुरू की है। हालिया रिपोर्टों के अनुसार भारत सरकार उन तेल और गैस के जहाजों की सुरक्षा को लेकर चिंतित है, जो मध्य पूर्व से भारतीय बंदरगाहों तक ऊर्जा लेकर आते हैं। इसी वजह से भारत अब अमेरिका के साथ समुद्री सुरक्षा सहयोग को लेकर चर्चा कर रहा है, ताकि संकट की स्थिति में इन जहाजों को सुरक्षा दी जा सके।
अमेरिका से समुद्री सुरक्षा सहयोग पर बातचीत
सरकारी सूत्रों के अनुसार भारत चाहता है कि यदि क्षेत्र में सुरक्षा हालात और बिगड़ते हैं, तो अमेरिकी नौसेना जरूरत पड़ने पर तेल और गैस लेकर आने वाले जहाजों को सुरक्षा प्रदान करे। यह सुरक्षा खासतौर पर उन संवेदनशील समुद्री मार्गों पर जरूरी मानी जा रही है, जहां से बड़ी मात्रा में ऊर्जा आपूर्ति गुजरती है। भारत की चिंता का मुख्य कारण यह है कि अगर इन रास्तों पर हमला या अवरोध होता है, तो देश की ऊर्जा सप्लाई पर सीधा असर पड़ सकता है।
होर्मुज जलडमरूमध्य क्यों है इतना महत्वपूर्ण
होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों में से एक माना जाता है। इस संकरे समुद्री रास्ते से दुनिया की कुल तेल और गैस खपत का लगभग 20 प्रतिशत हिस्सा गुजरता है। लेकिन हाल के महीनों में अमेरिका, इजराइल और ईरान के बीच बढ़ते तनाव ने इस क्षेत्र को बेहद संवेदनशील बना दिया है। सैन्य गतिविधियों और हमलों के खतरे के कारण यहां से गुजरने वाले तेल टैंकरों और गैस जहाजों की सुरक्षा को लेकर चिंता बढ़ गई है।
अमेरिका का समुद्री व्यापार को समर्थन
अमेरिका ने भी इस स्थिति को देखते हुए समुद्री व्यापार की सुरक्षा के लिए कुछ कदम उठाए हैं। अमेरिकी प्रशासन ने सरकारी एजेंसियों को यह निर्देश दिया है कि वे समुद्री व्यापार से जुड़े जोखिमों को कम करने के लिए वित्तीय सहायता और राजनीतिक जोखिम बीमा उपलब्ध कराएं। इसके अलावा संकेत दिए गए हैं कि यदि जरूरत पड़ी तो अमेरिकी नौसेना जहाजों को सुरक्षा देते हुए उन्हें सुरक्षित तरीके से इस संवेदनशील समुद्री रास्ते से गुजरने में मदद कर सकती है।
भारत के लिए मध्य पूर्व क्यों है अहम
भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा मध्य पूर्व से पूरा करता है। देश के कुल कच्चे तेल आयात का लगभग 40 प्रतिशत इसी क्षेत्र से आता है। इसके अलावा घरेलू उपयोग के लिए इस्तेमाल होने वाली रसोई गैस यानी एलपीजी की लगभग 85 से 90 प्रतिशत आपूर्ति भी मध्य पूर्व के देशों से होती है। ऐसे में अगर इस क्षेत्र में युद्ध या समुद्री मार्गों में बाधा आती है, तो भारत की ऊर्जा सुरक्षा पर गंभीर असर पड़ सकता है।
भारत की वैकल्पिक ऊर्जा रणनीति
संभावित ऊर्जा संकट से बचने के लिए भारत अब अलग-अलग देशों और अंतरराष्ट्रीय कंपनियों के साथ बातचीत कर रहा है। सरकार कई ऊर्जा कंपनियों के साथ तेल और गैस की खरीद को लेकर चर्चा कर रही है, ताकि आपूर्ति के विकल्प बढ़ाए जा सकें। इस कदम का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि अगर किसी एक क्षेत्र से सप्लाई प्रभावित होती है, तो दूसरे स्रोतों से ऊर्जा मिलती रहे और देश में ऊर्जा संकट न पैदा हो।
भारत के ऊर्जा क्षेत्र पर पड़ने लगा असर
पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव का असर अब धीरे-धीरे भारत के ऊर्जा क्षेत्र में भी दिखाई देने लगा है। कुछ कंपनियों ने एहतियात के तौर पर ईंधन के निर्यात को अस्थायी रूप से रोक दिया है और कुछ रिफाइनरी इकाइयों का संचालन सीमित कर दिया है। इसके अलावा गैस आपूर्ति में भी कमी देखी जा रही है, जिससे ऊर्जा बाजार में चिंता बढ़ी है।
गैस सप्लाई में आई कमी
भारत के प्रमुख गैस आपूर्तिकर्ता देशों में शामिल कतर से आने वाली गैस की सप्लाई भी प्रभावित हुई है। समुद्री मार्गों में बाधा और सुरक्षा चिंताओं के कारण भारत को रोजाना मिलने वाली गैस की मात्रा में कमी आई है। रिपोर्ट के मुताबिक, भारत को प्रतिदिन मिलने वाली गैस में लगभग 60 मिलियन स्टैंडर्ड क्यूबिक मीटर की कमी देखी जा रही है।
सरकार की संभावित आपूर्ति योजना
सरकार का कहना है कि यदि पश्चिम एशिया में हालात और बिगड़ते हैं और ऊर्जा आपूर्ति में और कमी आती है, तो देश में गैस की सप्लाई को प्राथमिकता के आधार पर अलग-अलग क्षेत्रों में बांटा जा सकता है। इसका मकसद यह होगा कि बिजली उत्पादन, घरेलू गैस और जरूरी उद्योगों जैसी महत्वपूर्ण सेवाओं को पहले गैस उपलब्ध कराई जाए, ताकि आर्थिक गतिविधियों पर ज्यादा असर न पड़े।
पश्चिम एशिया में बढ़ते संघर्ष और समुद्री मार्गों की असुरक्षा ने वैश्विक ऊर्जा बाजार को प्रभावित करना शुरू कर दिया है। भारत जैसे बड़े ऊर्जा आयातक देश के लिए यह स्थिति चुनौतीपूर्ण है। इसी वजह से भारत एक तरफ अपने पारंपरिक ऊर्जा स्रोतों की सुरक्षा सुनिश्चित करने की कोशिश कर रहा है, वहीं दूसरी तरफ वैकल्पिक आपूर्ति स्रोतों की तलाश भी तेज कर दी गई है, ताकि देश की ऊर्जा जरूरतें बिना किसी बड़े व्यवधान के पूरी होती रहें।