Edited By Anu Malhotra,Updated: 15 Jan, 2026 03:51 PM

असम सरकार के हालिया फैसले ने देशभर में जमीन की खरीद-बिक्री के नियमों को लेकर एक नई बहस छेड़ दी है, जिससे यह सवाल उठने लगा है कि क्या किसी खास समुदाय के लिए अब संपत्ति खरीदना कठिन हो जाएगा। दरअसल, असम की हिमंता बिस्वा सरमा सरकार ने राज्य की...
नेशनल डेस्क: असम सरकार के हालिया फैसले ने देशभर में जमीन की खरीद-बिक्री के नियमों को लेकर एक नई बहस छेड़ दी है, जिससे यह सवाल उठने लगा है कि क्या किसी खास समुदाय के लिए अब संपत्ति खरीदना कठिन हो जाएगा। दरअसल, असम की हिमंता बिस्वा सरमा सरकार ने राज्य की जनसांख्यिकी यानी डेमोग्राफी में आ रहे बदलावों को रोकने के लिए भूमि हस्तांतरण के नियमों में बड़ा बदलाव किया है।
अब असम में हिंदू और मुस्लिम समुदायों के बीच जमीन का लेन-देन सीधा नहीं हो सकेगा। नए कानून के तहत, यदि अलग-अलग धर्म के व्यक्ति आपस में जमीन का सौदा करते हैं, तो उन्हें जिला उपायुक्त यानी डीसी या जिला मजिस्ट्रेट से औपचारिक मंजूरी लेनी होगी। सरकार का तर्क है कि कई इलाकों में स्वदेशी लोगों की जमीनें दबाव में या आर्थिक लाचारी के कारण बेची जा रही थीं, जिसे 'लैंड जिहाद' जैसी संज्ञा भी दी जा रही है।
इस कानून के पीछे मुख्य वजह बांग्लादेशी घुसपैठ और सीमावर्ती जिलों में बदलता जनसंख्या संतुलन बताया गया है। धुबरी, बारपेटा और नगांव जैसे जिलों में मूल निवासियों की घटती संख्या को देखते हुए सरकार ने जिला प्रशासन को यह जिम्मेदारी सौंपी है कि वह हर अंतर-धार्मिक सौदे की गहन जांच करे। जिला उपायुक्त यह सुनिश्चित करेंगे कि जमीन की बिक्री किसी जबरदस्ती या डरा-धमका कर तो नहीं की जा रही है और क्या इस सौदे से उस क्षेत्र के सामाजिक ढांचे पर कोई बुरा असर पड़ेगा।
हालांकि, यह नियम एक ही धर्म के लोगों के बीच होने वाली खरीद-बिक्री पर लागू नहीं होगा। इस कदम का व्यापक असर पूर्वोत्तर के अन्य राज्यों पर भी पड़ने की संभावना है, जहाँ पहले से ही जमीन की सुरक्षा के लिए 'इनर लाइन परमिट' जैसे कड़े प्रावधान मौजूद हैं।
दूसरी ओर, इस फैसले को लेकर राजनीतिक गलियारों में भारी विरोध भी शुरू हो गया है। कांग्रेस और एआईयूडीएफ जैसे विपक्षी दलों का कहना है कि अपनी संपत्ति अपनी मर्जी से बेचना किसी भी नागरिक का मौलिक अधिकार है और सरकार का यह हस्तक्षेप असंवैधानिक है। विपक्ष इसे सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की कोशिश बता रहा है, जबकि विश्व हिंदू परिषद जैसे संगठन इसे पूरे देश में लागू करने की मांग कर रहे हैं।
असम सरकार का मानना है कि राज्य की सांस्कृतिक पहचान और भौगोलिक विरासत को बचाने के लिए यह एक अनिवार्य सुरक्षा कवच है। आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या बिहार, पश्चिम बंगाल और झारखंड जैसे राज्य भी असम की राह पर चलते हैं, जहाँ घुसपैठ और जनसांख्यिकीय बदलाव के मुद्दे अक्सर चुनावी चर्चा के केंद्र में रहते हैं।